तिलका मांझी : भारत के प्रथम आदिविद्रोही स्वतंत्रतासेनानी

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भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय संथाल आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को माना जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया। इनमें सबसे लोकप्रिय संथाल आदिविद्रोही तिलका मांझी हैं।
(दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है।)

तिलका मांझी का जन्म एवं परिचय

तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में ‘तिलकपुर’ नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। वैसे उनका वास्तविक नाम ‘जबरा पहाड़िया’ ही था। तिलका मांझी नाम तो उन्हें ब्रिटिश सरकार ने दिया था। पहाड़िया भाषा में ‘तिलका’ का अर्थ है गुस्सैल और लाल-लाल आंखों वाला व्यक्ति होता है। चूँकि वें ग्राम प्रधान भी थे और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को मांझी कहकर पुकारने की प्रथा है अत: अंग्रेज़ों ने जबरा पहाड़िया को तिलका (खूंखार डाकू और गुस्सैल) मांझी (समुदाय प्रमुख) कहा। ब्रिटिशकालीन दस्तावेज़ों में भी ‘जबरा पहाड़िया’ का नाम मौजूद हैं परन्तु ‘तिलका’ का कहीं उल्लेख नहीं है।

तिलका मांझी ने आदिवासियों द्वारा किये गये प्रसिद्ध ‘आदिवासी विद्रोह’ का नेतृत्व किया. वर्ष 1771 से 1784 तक अंग्रेजों से लंबी लड़ाई लड़ी और वर्ष 1778 में पहाड़िया सरदारों के साथ मिलकर रामगढ़ कैंप को अंग्रेजों से मुक्त कराया. तिलका मांझी भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे. सन् 1857 की क्रांति से लगभग सौ साल पहले स्वाधीनता का बिगुल फूंकने वाले तिलका मांझी को इतिहास में खास तवज्जो नहीं दी गयी.

जिस समय ब्रिटानी सल्तनत, साम-दाम, दंड भेद की नीति अपनाकर भारत के चप्पे-चप्पे पर अपना व्यापारिक राज्य बढ़ा रही थी. उस समय बिहार के जंगलों में कोई था जो उनके खिलाफ आंधी बहा रहा था. ब्रितानी साम्राज्य जो कि अभी जमा भी नहीं था, उसे यह बांकुरा चुनौती दे रहा था.

भले ही आपको हमारे इतिहास में तिलका मांझी के योगदान का कोई ख़ास उल्लेख न मिले, पर समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है।

बचपन से जंगलों और आदिवासियों पर अत्याचार देखा

उनका ज्यादा जीवन गांवों और जंगलों में कटा था. वो धनुष-बाण चलाने और जंगली जानवरों का शिकार में प्रवीण थे. कसरत-कुश्ती, बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़ना-उतरना, जंगलों में बेधड़क घूमना उनका रोजाना का काम था. वो निडर और वीर थे. तिलका मांझी ने बचपन से ही जंगलों की हरियाली और आदिवासियों पर अत्याचार होते हुए देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासकों ने कब्जा कर लिया था।

अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया और शोषकों से लड़े

तिलका मांझी ने न केवल अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया बल्कि, वे देसी दिकुओं यानि शोषकों के खिलाफ भी लड़े। आदिवासियों को जंगल और ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए अंग्रेज़ों और दिकुओं ने आपस में गठजोड़ कर लिया था।

वे अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों के सामने परंपरागत शस्त्रों से संघर्ष करते रहे। मांझी ​अंग्रेजों के खिलाफ कभी नहीं झुके। उन्होंने स्थानीय सूदखोरों-ज़मींदारों (दिकुओं) एवं अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया।

तिलका ने सेना बनाकर विद्रोह कर दिया

आखिरकार जब तिलका मांझी को लगा कि अंग्रेजों का अत्याचार कुछ ज्यादा ही हो गया है तो उन्होंने ‘बनैचारी जोर’ नाम की जगह उनके खिलाफ विद्रोह शुरू किया. वीर तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने और लोगों को एकत्रित करने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभाओं में सम्बोधित करते थे। उनके जोरदार भाषण से प्रेरित होकर बहुत सारे आदिवासी उनके आंदोलन में जुड़ गए। उन्होंने जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को अंग्रजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रेरित किया ताकि भारत से अंग्रेजी शासन खत्म हो जाए।

इस विद्रोह में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों से लोहा लिया। तिलका मांझी ने 1778 में पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़कर कैंप को अंग्रेजों से मुक्त कराया।

अंग्रेजों ने तत्कालीन भागलपुर कमिश्नर ब्रिटिश कमिश्नर ऑगस्टस क्लीव लैंड को मजिस्ट्रेट बनाकर वहां हालात को काबू करने भेजा. तिलका मांझी ने उसके खिलाफ लड़ाई की शुरुआत की। 13 जनवरी 1784 को तिलका मांझी ने पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार इस अँगरेज़ अधिकारी को तीर से निशाना बनाकर मौत के घाट उतार दिया। इसके उपरांत अंग्रेजी सैनिक भय से कांप उठे। इस घटना के बाद अंग्रेज तिलका मांझी को पकड़ने के लिए जंगलों गांवों में छानबीन करना शुरू कर दिया।

एक रात जब तिलका मांझी और उनके क्रांतिकारी साथी उत्सव मना रहे थे तो सेनापति आयरकुट ने उनके ठिकाने हमला कर दिया। तिलका मांझी किसी तरह वहां से बच निकले। इसके बाद भी उन्होंने अग्रेजों के खिलाफ विद्रोह जारी रखा। अंग्रेजी सेना उसे पकड़ने में नाकाम हो रही थी।
तिलका मांझी राजमहल की पहाड़ियों में कई लड़ाईयां लड़ी। तिलका मांझी पहाड़ में रहकर अंग्रेजों से लोहा ले रहा था इसी दौरान अंग्रेजों ने चारों तरफ से पहाड़ को घेर लिया और तिलका मांझी तक पहुंचने वाली सारी सुविधाओं को रोक दिया जिस कारण तिलका मांझी को अन्न,भोजन का भी दिक्कत होने लगा। तब वे पहाड़ से निकालकर अंग्रेजों से लड़ना शुरू कर दिया, अंतत: एक दिन अंग्रेजों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। फिर उन्हे घोड़े से घसीटकर भागलपुर लाया गया।

वीर तिलका मांझी की शहादत

  • 13 जनवरी 1785 को वीर तिलका मांझी को भागलपुर में एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दिया गया।
  • बाद में आजादी के हजारों लड़ाकों ने जबरा पहाड़िया का अनुसरण किया और फांसी पर चढ़ते हुए जो गीत गाए – हांसी-हांसी चढ़बो फांसी …! – वह आज भी हमें इस आदिविद्रोही की याद दिलाते हैं।

साहित्य में जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी

समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है. बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिकामहाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की है। अपने इस उपन्यास में महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी को मुर्मू गोत्र का संताल आदिवासी बताया है। यह उपन्यास हिंदी में ‘शालगिरह की पुकार पर’ नाम से अनुवादित और प्रकाशित हुआ है।

हिंदी के उपन्यासकारराकेश कुमार सिंह ने जबकि अपने उपन्यास ‘हूल पहाड़िया’ में तिलका मांझी को जबरा पहाड़िया के रूप में चित्रित किया है। ‘हूल पहाड़िया’ उपन्यास 2012 में प्रकाशित हुआ है।

तिलका मांझी के सम्मान मे

तिलका मांझी के नाम परभागलपुर में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय नाम से एक शिक्षा का केंद्र स्थापित किया गया है।

गोड्डा मेंतिलका मांझी कृषि महाविद्यालय है।

बहुत सारे चौक चौराहों में उनकी मूर्ति स्थापित किया गया है।

गीत के माध्यम से इस महान सपूत को याद किया जाता है।

दोस्तों आज भी बिहार झारखंड के लोग गीत के माध्यम से इस महान सपूत को याद करते हैं। अनेक आदिवासी लड़ाके तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़े. अनके गीतों-कविताओं में तिलका मांझी को विभिन्न रूपों में याद किया जाता है-

तुम पर कोडों की बरसात हुई

तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए

फिर भी तुम्हें मारा नहीं जा सका

तुम भागलपुर में सरेआम

फांसी पर लटका दिए गए

फिर भी डरते रहे ज़मींदार और अंग्रेज़

तुम्हारी तिलका (गुस्सैल) आंखों से

मर कर भी तुम मारे नहीं जा सके

तिलका माझी

मंगल पांडेय नहीं, तुम

आधुनिक भारत के पहले विद्रोही थे

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