सूचना का अधिकार अधिनियम् (Right To Information Bill) 2005

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यू.पी.ए.) की सरकार ने न्युनतम साझा कार्यक्रम में किए गए अपने वायदो तथा पारदर्शिता-युक्त शासन व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए 12 मई 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 संसद में पारित किया, जिसे 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली और अन्ततः 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया।

क्यूँ जरूरी है

  • भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी ही देश का असली मालिक होता है। इसलिए जनता को यह जानने का हक है कि जो सरकार उसकी सेवा के लिए बनाई गई है वह क्या, कहां और कैसे काम कर रही है। सरकार की प्रणाली और प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये सूचना तक पहुँच सुनिश्चित करना एक आवश्यक कदम है, ताकि भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

पृष्ठभूमि

  • सूचना के अधिकार से संबंधित विश्व में सबसे पहला कानून वर्ष 1766 में स्वीडन द्वारा लागू किया गया था, इसके बाद वर्ष 1966 में अमेरिका ने भी इस संबंध में एक कानून अपना लिया। कनाडा ने 1982, फ्रांस ने 1978 एवं मैक्सिको ने 2002 में इसे लागू किया।
  • वर्ष 1990 आते-आते सूचना के अधिकार से संबंधी कानून लागू करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 13 हो गई थी। सूचना का अधिकार कानून आज विश्व के 80 से देशों के लोकतंत्र की शोभा बढ़ा रही है।
  • जिन देशों ने सूचना के अधिकार को महत्ता दी है बेशक उनमें से स्वीडन को भूलाया नहीं जा सकता। अगर साफ शब्दों में कहा जाए तो स्वीडन सूचना अधिकार कानून की जननी है।
  • सन् 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, लेकिन संविधान निर्माताओ ने संविधान में इसका कोई भी वर्णन नहीं किया और न ही अंग्रेज़ो का बनाया हुआ शासकीय गापनीयता अधिनियम 1923 का संशोधन किया। आने वाली सरकारों ने गोपनीयता अधिनियम 1923 की धारा 5 व 6 के प्रावधानों का लाभ उठकार जनता से सूचनाओं को छुपाती रही।
  • 1976 में राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश मामले में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19 में विर्णत सूचना के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया।

भारत में शुरुआत

  • भारत में इस संबंध में कानून बनाने के लिये आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1987 में तब हुई जब राजस्थान के कुछ मज़दूरों को उनके असंतोषजनक प्रदर्शन का हवाला देते हुए वेतन देने से इनकार कर दिया।
  • भ्रष्टाचार की आशंका को देखते हुए मज़दूरों के हक में लड़ रहे मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) ने स्थानीय अधिकारियों से संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की मांग की।
  • सार्वजानिक विरोध प्रदर्शन के बाद जब प्रासंगिक दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए तो सरकारी अधिकारियों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार भी सामने आ गया।
  • समय के साथ यह आंदोलन और ज़ोर पकड़ता गया और जल्द ही सूचना के अधिकार (RTI) की मांग करते हुए इस आंदोलन ने देशव्यापी रूप ले लिया।
  • आंदोलन को बड़ा होते देख सरकार ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 पारित कर दिया, जिसने आगे चलकर वर्ष 2005 में सूचना के अधिकार अधिनियम का रूप लिया।
  • वर्ष 2005 में पुणे पुलिस स्टेशन को RTI के तहत पहली याचिका प्राप्त हुई थी।

सूचना का अधिकार अधिनियम हर नागरिक को अधिकार देता है कि वह

  • सरकार से कोई भी सवाल पूछ सके या कोई भी सूचना ले सके.
  • किसी भी सरकारी दस्तावेज़ की प्रमाणित प्रति ले सके.
  • किसी भी सरकारी दस्तावेज की जांच कर सके.
  • किसी भी सरकारी काम की जांच कर सके.
  • किसी भी सरकारी काम में इस्तेमाल सामग्री का प्रमाणित नमूना ले सके.
  • प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लाॅपी, टेप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  • प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए हैं, जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।
  • जनसूचना अधिकारी की दायित्व है कि वह 30 दिन अथवा जीवन स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टे के अन्दर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) मांगी गई सूचना उपलब्ध कराए।
  • यदि जनसूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध् कराता है अथवा गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का जुर्माना उसके वेतन में से काटा जा सकता है। साथ ही उसे सूचना भी देनी होगी।
  • लोक सूचना अधिकारी को अधिकार नहीं है कि वह आपसे सूचना मांगने का कारण पूछ सकता।
  • यदि कोई लोक सूचना अधिकारी यह समझता है कि मांगी गई सूचना उसके विभाग से सम्बंधित नहीं है तो यह उसका कर्तव्य है कि उस आवेदन को पांच दिन के अन्दर सम्बंधित विभाग को भेजे और आवेदक को भी सूचित करे। ऐसी स्थिति में सूचना मिलने की समय सीमा 30 की जगह 35 दिन होगी।
  • लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदन लेने से इंकार करता है। अथवा परेशान करता है। तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाओं को अस्वीकार करने, अपूर्ण, भ्रम में डालने वाली या गलत सूचना देने अथवा सूचना के लिए अधिक फीस मांगने के खिलाफ केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकते है।
  • जनसूचना अधिकारी कुछ मामलों में सूचना देने से मना कर सकता है। जिन मामलों से सम्बंधित सूचना नहीं दी जा सकती उनका विवरण सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 में दिया गया है। लेकिन यदि मांगी गई सूचना जनहित में है तो धारा 8 में मना की गई सूचना भी दी जा सकती है। जो सूचना संसद या विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता उसे किसी आम आदमी को भी देने से मना नहीं किया जा सकता।
  • यदि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित जनसूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है।
  • यदि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 90 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास करनी होती है।
  • द्वितीय अपील के तहत केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग के आदेश से संतुष्ट न होने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

ये विभाग हैं दायरे में

– राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री दफ्तर
– संसद और विधानमंडल
– चुनाव आयोग
– सभी अदालतें

– तमाम सरकारी दफ्तर
– सभी सरकारी बैंक
– सारे सरकारी अस्पताल
– पुलिस महकमा
– सेना के तीनों अंग
– पीएसयू
– सरकारी बीमा कंपनियां
– सरकारी फोन कंपनियां
– सरकार से फंडिंग पाने वाले एनजीओ

इन पर लागू नहीं होता कानून

– किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां, जिनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा हो
– दूसरे देशों के साथ भारत से जुड़े मामले
– थर्ड पार्टी यानी निजी संस्थानों संबंधी जानकारी लेकिन सरकार के पास उपलब्ध इन संस्थाओं की जानकारी को संबंधित सरकारी विभाग के जरिए हासिल कर सकते हैं

आरटीआई कार्यकर्ता कौन है

भारत का कोई भी नागरिक जो आम जनता के लिए (जनहित मे) सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना प्राप्त करता है।

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के समक्ष चुनौतियां 

  • राष्ट्रीय और राज्य, दोनों स्तरों पर लंबित मामलों की अत्यधिक संख्या।
  • अर्थदंड का आरोपण न होना – 20 आयोगों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों से पता चलता है कि निपटाए गए मामलों में केवल4% मामलों में जुर्माना आरोपित किया गया था।
  • अनुचित कार्यों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में अब तक सैकड़ो RTI कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं।
  • सूचनाओं के प्रकाशन में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई लापरवाही।

उपर्युक्त चुनौतियों के लिए उत्तरदायी कारणों में निम्न शामिल हैं:

  • नौकरशाही के तहत रिकॉर्ड संरक्षण की निम्नस्तरीय कार्यप्रणाली।
  • सूचना आयोग के सुचारु रूप से कार्य करने हेतु आधारभूत संरचना और कर्मचारियों की कमी।
  • व्हिसल-ब्लोअर संरक्षण अधिनियम जैसे अनुपूरक कानूनों का कमज़ोर होना।
  • सिविल सेवकों को अधिनियम को लागू करने के संबंध में दिया गया अपर्याप्त प्रशिक्षण।
  • सूचना आयुक्तों की विलंबित नियुक्तियां।

 

सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019

हाल ही में लोकसभा ने सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 [Right to Information (Amendment) Bill, 2019] पारित किया। इस विधेयक में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को संशोधित करने का प्रस्ताव किया गया है।

संशोधन के प्रमुख बिंदु:

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner) और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है, परंतु संशोधन के तहत इसे परिवर्तित करने का प्रावधान गया है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा।
  • नए विधेयक के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते तथा अन्य रोज़गार की शर्तें भी केंद्र सरकार द्वारा ही तय की जाएंगी।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 यह प्रावधान करता है कि यदि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त पद पर नियुक्त होते समय उम्मीदवार किसी अन्य सरकारी नौकरी की पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त करता है तो उस लाभ के बराबर राशि को उसके वेतन से घटा दिया जाएगा, लेकिन इस नए संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।

 

कैसे लिखें आरटीआई ऐप्लिकेशन

– सूचना पाने के लिए कोई तय प्रोफार्मा नहीं है। सादे कागज पर हाथ से लिखकर या टाइप कराकर 10 रुपये की तय फीस के साथ अपनी ऐप्लिकेशन संबंधित अधिकारी के पास किसी भी रूप में (खुद या डाक द्वारा) जमा कर सकते हैं।

– आप हिंदी, अंग्रेजी या किसी भी स्थानीय भाषा में ऐप्लिकेशन दे सकते हैं।

– ऐप्लिकेशन में लिखें कि क्या सूचना चाहिए और कितनी अवधि की सूचना चाहिए?

– आवेदक को सूचना मांगने के लिए कोई वजह या पर्सनल ब्यौरा देने की जरूरत नहीं। उसे सिर्फ अपना पता देना होगा। फोन या मोबाइल नंबर देना जरूरी नहीं लेकिन नंबर देने से सूचना देने वाला विभाग आपसे संपर्क कर सकता है।

कैसे जमा कराएं फीस

– केंद और दिल्ली से संबंधित सूचना आरटीआई के तहत लेने की फीस है 10 रुपये।

– फीस नकद, डिमांड ड्राफ्ट या पोस्टल ऑर्डर से दी जा सकती है। डिमांड ड्राफ्ट या पोस्टल ऑर्डर संबंधित विभाग (पब्लिक अथॉरिटी) के अकाउंट ऑफिसर के नाम होना चाहिए। डिमांड ड्राफ्ट के पीछे और पोस्टल ऑर्डर में दी गई जगह पर अपना नाम और पता जरूर लिखें। पोस्टल ऑर्डर आप किसी भी पोस्ट ऑफिस से खरीद सकते हैं।

– गरीबी रेखा के नीचे की कैटिगरी में आने वाले आवेदक को किसी भी तरह की फीस देने की जरूरत नहीं। इसके लिए उसे अपना बीपीएल सर्टिफिकेट दिखाना होगा। इसकी फोटो कॉपी लगानी होगी।

– सिर्फ जन सूचना अधिकारी को ऐप्लिकेशन भेजते समय ही फीस देनी होती है। पहली अपील या सेंट्रल इन्फेर्मशन कमिश्नर को दूसरी अपील के लिए भी 10 रुपये की फीस देनी होगी।

– अगर सूचना अधिकारी आपको समय पर सूचना उपलब्ध नहीं करा पाता और आपसे 30 दिन की समयसीमा गुजरने के बाद डॉक्युमेंट उपलब्ध कराने के नाम पर अतिरिक्त धनराशि जमा कराने के लिए कहता है तो यह गलत है। ऐसे में अधिकारी आपको मुफ्त डॉक्युमेंट उपलब्ध कराएगा, चाहे उनकी संख्या कितनी भी हो।

एक्स्ट्रा फीस

सूचना लेने के लिए आरटीआई एक्ट में ऐप्लिकेशन फीस के साथ एक्स्ट्रा फीस का प्रोविजन भी है, जो इस तरह है :

– फोटो कॉपी: हर पेज के लिए 2 रुपये
– बड़े आकार में फोटो कॉपी: फोटो कॉपी की लागत कीमत
– दस्तावेज देखने के लिए: पहले घंटे के लिए कोई फीस नहीं, इसके बाद हर घंटे के लिए फीस 5 रुपये
– सीडी: एक सीडी के लिए 50 रुपये

सूचना के अधिकार अधिनियम की चुनौतियाँ

  • यह अधिनियम आम लोगों को प्रासंगिक जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है, किंतु निरक्षरता और जागरूकता की कमी के कारण भारत में अधिकांश लोग इस अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं।
  • कई लोग मानते हैं कि इस अधिनियम में प्रावधानों का उल्लंघन करने की स्थिति में जो जुर्माना/दंड दिया गया है वह इतना कठोर नहीं है कि लोगों को इस कार्य से रोक सके।
  • इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त जन जागरूकता का अभाव, सूचनाओं को संग्रहीत करने और प्रचार-प्रसार करने हेतु उचित प्रणाली का अभाव, सार्वजनिक सूचना अधिकारियों (PIOs) की अक्षमता और नौकरशाही मानसिकता आदि को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के कार्यान्वयन में बड़ी बाधा माना जाता है।

 

आवेदन का प्रारूप

 

किसी सरकारी विभाग में रुके हुए कार्य के विषय में सूचना के लिए आवेदन (राशनकार्ड, पासपोर्ट, वृद्धवस्था पेंशन, आयु-जन्म-मृत्यु-आवास आदि प्रमाण पत्र बनवाने या इन्कम टैक्स रिफण्ड मिलने में देरी होने, रिश्वत मांगने या बिना वजह परेशान करने की स्थिति में निम्न प्रश्नों के आधार पर सूचना के अधिकार का आवेदन तैयार करें)

 

सेवा में,
लोक सूचना अधिकारी
(विभाग का नाम)
(विभाग का पता)

विषय -सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन।

महोदय,

मैने आपके विभाग में ………… तारीख को ……………… के लिए आवेदन किया था। (आवेदन की प्रति संलग्न है) लेकिन अब तक मेरे आवेदन पर सन्तोषजनक कदम नहीं उठाया गया है।

कृपया इसके सन्दर्भ में निम्नलिखित सूचना उपलब्ध कराएं

  1. मेरेआवेदनपरकीगईप्रतिदिनकीकार्रवाईअर्थातदैनिकप्रगतिरिपोर्टउपलब्धकरायें।मेराआवेदनकिन-किनअधिकारियोंकेपासगयातथाकिसअधिकारीकेपासकितनेदिनोंतकरहाऔरइसदौरानउनअधिकारियोंनेउसपरक्याकार्रवाईकी? पूराविवरणउपलब्धकराएं
  1. विभागकेनियमकेअनुसारमेरेआवेदनपरअधिकतमकितनेदिनोंमेंकार्यवाहीपूरीहोजानीचाहियेथी? क्यामेरेमामलेमेंउपरोक्तसमयसीमाकापालनकियागयाहै?
  1. कृपयाउनअधिकारियोंकेनामतथापदबताएंजिन्हेंमेरेआवेदनपरकार्रवाईकरनीथी? लेकिनउन्होंनेकोईकार्रवाईनहींकी।
  1. अपनाकामठीकसेनकरनेऔरजनताकोपरेशानकरनेवालेइनअधिकारियोंकेखिलाफक्याकार्रवाईकीजाएगी? यहकार्रवाईकबतककीजाएगी?
  1. अबमेराकामकबतकपूराहोगा?

मैं आवेदन फीस के रूप में 10 रुपए अलग से जमा कर रहा /रही हूं।

या

मैं बी.पी.एल. कार्ड धारी हूं इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल. कार्ड नं…………..है।

यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से संबंधित नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयावधि के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।

भवदीय

नाम
पता
फोन नं

संलग्नक (यदि कुछ हो)

 

References :

http://www.gad.mp.gov.in/RTI%20handbook2005.pdf

http://ifmtr.up.nic.in

https://www.drishtiias.com

https://www.iasbook.com

https://www.kailasheducation.com/

 

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