वीर शहीद सिदो-कान्हू मुर्मू Sidho-Kanho Murmu

संथाल विद्रोह की पृष्ठ भूमि

संथाल परगना को पहले जंगल तराई के नाम से जाना जाता था। संथाल आदिवासी लोग संथाल परगना क्षेत्र में 1790 ई0 से 1810 ई0 के बीच बसे। संथाल परगना को अंग्रेजो द्वारा दामिन ए कोह कहा जाता था और इसकी घोषणा 1824 को हुई।

1832 में, अंग्रेजों ने वर्तमान झारखंड में दामिन-ए-कोह क्षेत्र का सीमांकन किया और संथालों को इस क्षेत्र में बसने के लिए आमंत्रित किया। भूमि और आर्थिक सुविधाओं के वादों के कारण कटक, धालभूम, मानभूम, हजारीबाग, मिदनापुर आदि से बड़ी संख्या में संथाल बसने आए। जल्द ही, अंग्रेजों द्वारा तैनात कर-संग्रह करने वाले बिचौलियों के रूप में महाजन और जमींदार अर्थव्यवस्था पर हावी हो गए। कई संताल भ्रष्ट धन उधार प्रथाओं के शिकार हो गए। उन्हें अत्यधिक दरों पर पैसा उधार दिया गया था जब वे कभी चुका नहीं सकते थे तो उनकी जमीनों को जबरन ले लिया गया था, उन्हें बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर किया गया था। इससे संताल विद्रोह भड़क उठा।

और इसी संथाल परगाना में संथाल आदिवासी परिवार में दो वीर भाइयों का जन्म हुआ जिसे हम सिदो-कान्हू मुर्मू के नाम से जानते हैं जिसने अंग्रेजो के आधुनिक हथियारों को अपने तीर धनुष के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया था।

सिदो-कान्हू मुर्मू का परिचय

सिदो-कान्हू मुर्मू का जन्म भोगनाडीह नामक गाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था जो कि वर्तमान में झारखण्ड के साहेबगंज जिला के बरहेट प्रखंड में है। सिदो मुर्मू का जन्म 1815 ई0 में हुआ था एवं कान्हू मुर्मू का जन्म 1820 ई0 में हुआ था।

संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके और दो भाई भी थे जिनका नाम चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू था। चाँद का जन्म 1825 ई0 में एवं भैरव का जन्म 1835 ई0 में हुआ था। इनके अलावा इनकी दो बहने भी थी जिनका नाम फुलो मुर्मू एवं झानो मुर्मू था। इन 6 भाई-बहनो का पिता का नाम चुन्नी माँझी था।

जन्म का स्थान

इन छः भाई बहनो का जन्म भोगनाडीह गाँव मे हुआ था जो कि वर्तमान में झारखण्ड राज्य के संथाल परगना  प्रमण्डल के साहेबगंज जिला के बरहेट प्रखण्ड के भोगनाडीह में है।

संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन का प्रारम्भ

सिदो-कान्हू ने 1855-56 मे ब्रिटिश सत्ता, साहुकारो, व्यपारियों व जमींदारो के अत्याचारों के खिलाफ एक विद्रोह का बिगुल फूंका जिसे संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। संथाल विद्रोह का नारा था “करो या मरो अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो” ।

सिदो ने अपनी दैवीय शक्ति का हवाला देते हुए सभी मांझीयों को साल की टहनी भेजकर संथाल हुल में शामिल होने के लिए आमंत्रन भेजा। 30 जून, 1855 को 400 गांवों के करीब 50 हजार आदिवासी भगनाडीह गांव पहुंचे और आंदोलन की शुरुआत हुई। इस सभा में सिदो को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को मंत्री एवं भैरव को सेनापति चुना गया और नये संथाल राज्य के गठन की घोषणा कर दी गई। महाजन, पुलिस, जमींदार, तेल अमला, सरकारी कर्मचारी के साथ ही अंगेजों गोरों को मार भगाने का संकल्प लिया गया तथा लगान नहीं देने व सरकारी आदेश नहीं मानने का निश्चय भी किया गया।

इसके बाद अंग्रेजों ने, सिद्धू, कान्हू, चांद तथा भैरव- इन चारों भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। जिस दरोगा, महेश लाल एवं प्रताप नारायण को चारों भाइयों को गिरफ्तार करने के लिए वहां भेजा गया था, संथालियों ने उसकी गर्दन काट कर हत्या कर दी। इस दौरान सरकारी अधिकारियों में भी इस आंदोलन को लेकर भय पैदा हो गया था। बाद में, संथालो के भय से अंग्रेजो ने बचने के लिए पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण कराया गया जो आज भी झारखण्ड के पाकुड़ जिले में स्थित है।

7 जुलाई 1855 को प्रारम्भ हुए इस आंदोलन को दबाने हेतु जनरल लॉयर्ड के नेतृत्व में एक फौजी टुकड़ी भेजी गई जो आधुनिक हथियारों और गोला बारूद से परिपूर्ण थे।

संथालों को शुरू में कुछ सफलता मिली लेकिन जल्द ही अंग्रेजों ने इन विद्रोहियों से निपटने का एक नया तरीका खोज लिया। इसके बजाय कि उन्हें जंगल से बाहर आने के लिए मजबूर किया, अंग्रेजों ने आधुनिक आग्नेयास्त्रों और हाथियों से लैस टुकड़ियों के साथ खुद को पहाड़ी की तलहटी में तैनात कर लिया। जब लड़ाई शुरू हुई, तो ब्रिटिश अधिकारी ने अपने सैनिकों को बिना गोलियां लोड किए गोली चलाने का आदेश दिया। संथाल, जिन्हें ब्रिटिश युद्ध की इस रणनीति का अंदेशा नहीं था, जैसे ही पहाड़ी की तलहटी के पास पहुंचे, ब्रिटिश सेना ने गोलियों का इस्तेमाल कर पूरी ताकत से हमला कर दिया।

सिदो-कान्हू की शहादत

बहराइच में अंग्रेजों और आंदोलनकारियों की लड़ाई में चांद और भैरव शहीद हो गए। इस युद्ध में लगभग 20,000 वनवासी वीरों ने प्राणाहुति दी। सिद्धू और कान्हू के करीबी साथियों को पैसे का लालच देकर दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 26 जुलाई को दोनों भाइयों को भगनाडीह गांव में खुलेआम एक पेड़ पर टांगकर फांसी की सजा दे दी गई। इस तरह सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव, ये चारों भाई सदा के लिए भारतीय इतिहास में अपना अमिट स्थान बना गए। सिदो को जिस पेड़ मे फांसी दे दी गई वह आज भी पंचकठिया में स्थित है, जिसे शहीद स्थल कहा जाता है।

यद्धपि इस महान क्रांति को दबा दिया गया था, परन्तु इसने औपनिवेशिक शासन और नीति में एक महान परिवर्तन को चिह्नित किया। संथालो के इस बलिदान ने हार के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से हिला कर रख दिया था। इस विद्रोह के बाद संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1876 को अधिनियमित किया गया था, जिसके अनुसार बंगाल के साथ झारखंड की सीमा के साथ संथाल परगना क्षेत्र में गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि की बिक्री पर रोक लगा दिया गया।

फूलोझानो का बलिदान

संताल हूल का नेतृत्व करनेवाले अपने वीर भाइयों सिदो, कान्हू, चांद, भैरव के साथ फूलो और झानो भी कदम से कदम मिला कर देसी दस्ता और औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ लड़ी गयी लड़ाई में फूलो और झानो की केंद्रीय भूमिका थी. भाइयों ने नेतृत्व और हौसला दिया, तो इन दोनों बहनों ने हूल के मूल उद्देश्य को अपने क्षेत्र के जन-जन तक पहुंचाया। पाकुड़ के निकट संग्रामपुर में अंधेरे का फायदा उठाकर फूलो और झानो अंग्रेजों के शिविर में ही दाखिल हो गयीं और अपनी कुल्हाड़ी से 21 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और उसी संघर्ष में लड़ते-लड़ते शहीद हो गयीं, पर हूल के जज्बे को मिटने नहीं दिया।

संताली भाषा के गीत की पंक्तियां हैं ‘फूलो झानो आम दो तीर रे तलरार रेम साअकिदा’ अर्थात फूलो झानो तुमने हाथों में तलवार उठा लिया. ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी’ से पहले तलवार उठानेवाली इन दोनों आदिवासी बहनों के बारे में इतिहास चुप्पी साधे रहा।

लोकगीतों कथाओं में मिला सम्मानमुख्य धारा का इतिहास भले ही चुप रहा, पर संताली लोकगीतों और कथाओं में फूलो व झानो को सम्मान से याद किया जाता रहा. यहां तक कि बहनों को उनके समाज ने भाइयों से भी बढ़ कर माना- ‘आम दो लट्टु बोध्या खोअलहारे बहादुरी उदुकेदा’ अर्थात तुमने बड़े भाइयों से भी बढ़ कर बहादुरी दिखायी. चुन्नी मांझी की दोनों बहादुर बेटियों ने हूल की आग को भोगनाडीह गांव से समूचे राजमहल की पहाड़ियों में फैला दिया, जिसकी आंच इस्ट इंडिया कंपनी के मुख्यालय कलकत्ता तक पहुंच गयी थी.

साहित्य में सिदो-कान्हू

प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने इस युद्ध के बारे में अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है, ‘‘संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था। जब तक उनका ड्रम बजता रहता था, वे लड़ते रहते थे। जब तक उनमें से एक भी शेष रहा, वह लड़ता रहा। ब्रिटिश सेना में एक भी ऐसा सैनिक नहीं था, जो इस साहसपूर्ण बलिदान पर शर्मिन्दा न हुआ हो।’’

जर्मनी के समकालीन चिंतक कार्ल माक्र्स ने अपनी पुस्तक नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री में जून 1855 की संथाल क्रांति को जनक्रांति की संज्ञा दी है।

सिदो-कान्हू के संघर्ष की प्रशंसा करते हुए कवि गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी पुस्तक में इनका जिक्र किया है।

1856 ई में ही कोलकाता से प्रकाशित कलकत्ता रिव्यू में संताल हूल के महत्व को व्यापकता से स्वीकारा गया.

आज भी 30 जून को भोगनाडीह में हूल दिवस पर सरकार द्वारा विकास-मेला लगाया जाता है एवं वीर शहिद सिदो-कान्हू को याद किया जाता है।

सन्दर्भ:


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