भारत की विदेश नीति (Foreign Policy Of India)

कैसे परिभाषित होती है विदेश नीति? किसी देश की विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई स्वहितकारी रणनीतियों का समूह होती है। किसी देश की  विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिकराजनैतिकसामाजिक तथा सैनिक विषयों पर पालन की जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है। भारतीय विदेश नीति के मौलिक सिद्धांत
  • भारतीय विदेश नीति के मौलिक सिद्धांत भली-भांति परिभाषित हैं तथा ये आज भी लगभग वहीं हैं जिनका भारत की अंतरिम सरकार के प्रधान के रूप में 1946 में पंडित नेहरू ने वर्णन किया था। इनमें निरंतरता इसलिए बनी रही क्योंकि कुछ क्रांतिकारी घटनाओं के होते हुए भी वातावरण की मुख्य मांगे, अर्थात् विश्व शांति तथा सुरक्षा की रक्षा या उपनिवेशवाद तथा नस्ली भेदभाव की समाप्ति, आपसी असहयोग तथा मित्रता के बंधनों को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता, शक्ति राजनीति, शीत युद्ध से अलग रहने की आवश्यकता तथा संयुक्त राष्ट्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता आज भी उतनी ही वैध मानी जाती है जितनी कि 1946 में थी।
  • भारतकीविदेशनीतिकीमूलबातोंकासमावेशहमारेसंविधानकेअनुच्छेद 51 मेंकरदियागयाहैजिसकेअनुसारराज्यअंतरराष्ट्रीयशांतिऔरसुरक्षाकोबढ़ावादेगा, राज्यराष्ट्रोंकेमध्यन्यायऔरसम्मानपूर्वकसंबंधोंकोबनाएरखनेकाप्रयासकरेगा, राज्यअंतर्राष्ट्रीयकानूनोंतथासंधियोंकासम्मानकरेगातथाराज्यअंतर्राष्ट्रीयझगड़ोंकोपंचफैसलोंद्वारनिपटानेकीरीतिकोबढ़ावादेगा।
भारतीय विदेश नीति के मुलभूत सिद्धांत हैं: वर्ष 1954 में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत की संधि के दौरान शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पांच सिद्धांतों पर सहमति हुई जिन्हें पंचशील के नाम से जाना जाता है- बाद में इसका प्रयोग वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को संचालित करने के लिये भी किया गया। पाँच सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
  1. एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पारस्परिक सम्मान।
  2. पारस्परिक आक्रमण न करना।
  3. परस्पर हस्तक्षेप न करना।
  4. समता और आपसी लाभ।
  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
भारतीय विदेश नीति के महत्त्वपूर्ण पडाव
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलनभारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अगुआई में भारत ने वर्ष  1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non Alignment Movement) की स्थापना में सहभागिता की। जिसके तहत विकासशील देशों ने पश्चिमी व पूर्वी शक्तियों के समूहों को समर्थन देने से इंकार दिया।
  • गुजराल डॉक्ट्रिनवर्ष 1996 में तत्कालीन विदेश मंत्री रहे इंद्र कुमार गुजराल की विदेश नीति संबंधी विचारों को लेकर बने सिद्धांतों को गुजराल डॉक्ट्रिन कहा जाता है इसके तहत पड़ोसी देशों की बिना किसी स्वार्थ के मदद करने के विचार को प्राथमिकता दी गई।
  • नाभिकीय सिद्धांतभारत ने प्रथम नाभिकीय परीक्षण वर्ष 1974 तथा द्वितीय नाभिकीय परीक्षण वर्ष 1998 में किया। इसके बाद भारत अपने परमाणु सिद्धांत के साथ सामने आया । इस सिद्धांत के अनुसार भारत तब तक किसी देश पर हमला नहीं करेगा जब तक भारत पर हमला न किया जाए साथ ही भारत किसी गैर-नाभिकीय शक्ति संपन्न राष्ट्र पर नाभिकीय हमला नहीं करेगा।
भारत की विदेश नीति: मुख्य उद्देश्य
  • किसी भी अन्य देश के समान ही भारत की विदेश नीति का मुख्य और प्राथमिक उद्देश्य अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ को सुरक्षित करना है।
  • उल्लेखनीय है कि सभी देशों के लिये ‘राष्ट्रीय हित’ का दायरा अलग-अलग होता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय हित के अर्थ में क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिये हमारी सीमाओं को सुरक्षित करना, सीमा-पार आतंकवाद का मुकाबला, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा आदि शामिल हैं।
  • अपनी विकास गति को बढ़ाने के लिये भारत को पर्याप्त विदेशी सहायता की आवश्यकता होगी। विभिन्न परियोजनाओं जैसे- मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटीज़, इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, डिजिटल इंडिया, क्लीन इंडिया आदि को सफल बनाने के लिये भारत को विदेशी सहयोगियों, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, वित्तीय सहायता और टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है।
  • विश्व भर में भारत का डायस्पोरा भी काफी मज़बूत है और तकरीबन विश्व के सभी देशों में फैला हुआ है। भारत की विदेश नीति का एक अन्य उद्देश्य विदेशों में रह रहे भारतीय को संलग्न कर वहाँ उनकी उपस्थिति का अधिकतम लाभ उठाना है, इसी के साथ उनके हितों को सुरक्षित रखना भी आवश्यक होता है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत की विदेश की मुख्यतः 4 महत्त्वपूर्ण उद्देश्य हैं:
  1. भारत को पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों से बचाना।
  2. ऐसा वातावरण बनाना जो भारत के समावेशी विकास के लिये अनुकूल हो, जिससे देश में गरीब से-गरीब व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँच सके।
  3. यह सुनिश्चित करना की वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज़ सुनी जाए और विभिन्न वैश्विक आयामों जैसे- आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, निरस्त्रीकरण और वैश्विक शासन के मुद्दों को भारत प्रभावित कर सके।
  4. भारत के 30 मिलियन सशक्त प्रवासी हैं जिनमें अनिवासी भारतीय और भारतीय मूल के व्यक्ति शामिल हैं, जो पूरे विश्व में फैले हुए हैं। विदेशों में उनकी उपस्थिति से अधिकतम लाभ प्राप्त करना है, जबकि साथ ही यथासंभव उनके हितों की रक्षा करना है।
बदलती भारतीय विदेश नीति
  • भारत की वर्तमान विदेश नीति की सबसे खास विशेषता यह है कि इसमें पूर्व की सभी नीतियों की अपेक्षा जोखिम लेने की प्रवृत्ति सबसे अधिक है।
  • भारत अपनी दशकों पुरानी सुरक्षात्मक नीति को बदलते हुए कुछ हद तक आक्रामक नीति की ओर अग्रसर हो रहा है।
  • डोकलाम में भारत की कार्रवाई और वर्ष 2016 में उरी आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बदलते भारतीय नीति के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • बदलते वैश्विक राजनीतिक परिवेश में भारत अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिये किसी भी औपचारिक समूह पर निर्भरता को सीमित कर रहा है।
  • भारत ने अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने का एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया है और अमेरिका तथा रूस के साथ भारत के संबंध इस तथ्य के प्रमुख उदाहरण हैं।
भारत की विदेश नीति के समक्ष चुनौतियाँ:
  • विदेश नीति के मामले में भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं है कि अपने निकट पड़ोसी देशों, आसियान एवं पश्चिम एशिया समेत सुदूर स्थित पड़ोसी देशों को किस तरह संभाला जाए बल्कि विश्व की प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों किस प्रकार संतुलित किया जाए यह एक बड़ी चुनौती है।
  • चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के कारण उसके साथ संबंध बनाए रखना भारत के लिये चुनौती पूर्ण है।
  • रूस के साथ भारत के संबंध बहुत पुराने और विविधता भरे हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन के साथ भारत की बढ़ती निकटता से “भरोसेमंद और पुराने दोस्त” रूस के साथ भावनात्मक संबंधों की स्थिति जो पहले थी अब वह स्थिति नहीं है।
  • चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये अमेरिका को एशिया-प्रशांत एवं हिंद महासागर क्षेत्रीय सहयोग की अपनी रणनीतिक योजना के अनुरूप भारत का सहयोग मिल रहा है। लेकिन अमेरिका कभी भी भारत का विश्वसनीय सहयोगी नहीं रहा है और आज भी इस पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।
  • भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकी गतिविधियों को पोषित कर रहा है।
  • ईरान में चीन के बढ़ते प्रभाव को प्रतिसंतुलित करना भारत की विदेश नीति के लिये एक बड़ी चुनौती है।
  • अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद उत्पन्न होने वाली शक्ति-शून्यता की स्थिति भारतीय विदेश नीति के लिये चुनौती उत्पन्न करेगी।

आगे क्या  करना चाहिये

  • अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता में कमी आ सकती है, अतः आवश्यक है कि संबंधों में संतुलन बनाए रखा जाए।
  • भारत की प्रथम पड़ोस की नीति अच्छी है लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं क्षेत्रीय राजनीति में उलझकर हम अपने सुदूर मित्रों की अवहेलना न कर बैठें। अतः आवश्यकता इस बात की है किविश्व बंधुत्व’ की भावना जो भारत की पहचान रही है उसको आगे बढ़ाया जाय।
  • वर्तमान में अमेरिका-ईरान, इज़राइल-फिलीस्तीन, चीन-अमेरिका, अमेरिका-रूस आदि के बीच मनमुटाव चरम पर है। इसके बीच न सिर्फ राजनीतिक बल्कि आर्थिक गतिरोध भी बढ़ गये हैं। ऐसे में भारत को कोई भी कदम सोच समझकर उठाना होगा क्योंकि इन सभी देशों के साथ उसके आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।
  • पाकिस्तान को कुछ समय के लिये अलग-थलग करना सही हो सकता है लेकिन दीर्घकाल के लिये यह सही नहीं है। इसलिये वार्ता का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिये, क्योंकि पड़ोसी के विकास के बिना क्षेत्र में शांति स्थापित होना असंभव है।
  • हमें भारत-अमेरिका-जापान त्रिपक्षीय संवाद के साथ संपर्क और भी बढ़ाना चाहिये या बेहतर होगा कि समान क्षेत्रीय उद्देश्यों वाले समूह में ऑस्ट्रेलिया को भी शामिल कर चतुर्पक्षीय संपर्क बढ़ाया जाए।
Reference : https://hi.wikipedia.org/wiki https://www.drishtiias.com/hindi/daily-updates/daily-news-editorials/indian-foreign-policy http://www.vivacepanorama.com/indias-foreign-policy-non-alignment-and-panchsheel/ https://mea.gov.in/distinguished-lectures-detail-hi.htm?864

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