भारत की नई आर्थिक नीति (New Economic Policy of India)-1991

जून 1991 में नरसिंह राव सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को नयी दिशा प्रदान की। यह दिशा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण या एलपीजी मॉडल (Liberalisation, Privatisation and Globalisation-LPG Model) के रूप में जाना जाता है, पूरे देश में आर्थिक सुधारों के रूप में लागू की गयीउस समय मनमोहन सिंह भारत के वित्तमंत्री थे।

इससे पहले देश एक गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था और इसी संकट ने भारत के नीति निर्माताओं को नयी आर्थिक नीति को लागू के लिए मजबूर कर दिया था । संकट से उत्पन्न हुई स्थिति ने सरकार को मूल्य स्थिरीकरण और संरचनात्मक सुधार लाने के उद्देश्य से नीतियों का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।

नई आर्थिक नीति के मुख्य उद्देश्य

वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति आरम्भ करने के पीछे मुख्य उद्देश्य थे, वे निम्नलिखित है

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘वैश्वीकरण‘ के मैदान में उतारने के साथ-साथ इसे बाजार के रूख के अनुरूप बनाना।
  2. मुद्रास्फीतिकी दर को नीचे लाना और भुगतान असंतुलन को दूर करना।
  1. आर्थिक स्थिरीकरण को प्राप्त करने के साथ-साथ सभी प्रकार के अनावश्यक आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना। अर्थव्यवस्था के लिए बाजार अनुरूप एक आर्थिक परिवर्तिन लाना।
  2. प्रतिबंधों को हटाकर, माल, सेवाओं, पूंजी, मानव संसाधन और प्रौद्योगिकी के अन्तरराष्ट्रीय प्रवाह की अनुमति प्रदान करना।
  3. अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना। इसी कारण सरकार के लिए आरक्षित क्षेत्रों की संख्या घटाकर 3 कर दिया गया।

नई आर्थिक नीति की शाखाएं

  1. उदारीकरण

इससे पहले निजी क्षेत्र को एक नया उद्यम शुरू करने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था। इस नीति में निजी क्षेत्र को लाइसेंस और अन्य प्रतिबंधों से मुक्त कर दिया गया।

निम्न उद्योगों के लिए लाइसेंस अभी भी आवश्यक है:

  • परिवहन और रेलवे
  • परमाणु खनिजों का खनन
  • परमाणु ऊर्जा
  1. निजीकरण

इस नीति के तहत कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को निजी क्षेत्र को बेच दिया गया था। निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें निजी क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (पीएसयू) के मालिकाना हक का स्थानांतरण निजी हाथों में हो जाता है ।

निजीकरण के लिए उठाए गए कदम:

 शेयरों की बिक्री: भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों को सार्वजनिक और वित्तीय संस्थानों को बेच दिया, उदाहरण के लिए सरकार ने मारुति उद्योग लिमिटेड के शेयर बेच दिए । बेचे गए ये शेयर निजी उद्यमियों के हाथ में चले गए ।

  • पीएसयू में विनिवेश: सरकार ने उन पीएसयू में विनिवेश की प्रक्रिया शुरू कर दी थी जो घाटे में चल रहे थे और इन को निजी क्षेत्र में बेच दिया। सरकार ने 30000 करोड़ रूपये की कीमत के उद्यमों को निजी क्षेत्र को बेच दिया।
  • सार्वजनिक क्षेत्र का न्यूनीकरण: पहले ऐसा माना जाता था कि सार्वजनिक क्षेत्र औद्योगीकरण को बढ़ाने के साथ-साथ गरीबी को हटाने में भी मदद करता है। लेकिनये क्षेत्र लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रहे थे और इसी कारण बड़ी संख्या में उद्योगों को निजी क्षेत्रों के लिए आरक्षित कर दिया गया. पीएसयू की संख्या घटकर 17 से 3 कर दी गयी। 

3.   वैश्वीकरण

वैश्वीकरण का अर्थ वैश्विक या विश्व भर में फैलने से है, अन्यथा व्यापार को पूरी दुनिया में ले जाना है। वैश्वीकरण का अर्थ मोटे तौर पर विदेशी निवेश, व्यापार, उत्पादन और वित्तीय मामलों के संबंध में बाकी दुनिया के साथ घरेलू अर्थव्यवस्था को जोड़ना है ।

वैश्वीकरण के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए:

  • आयात दरों में कटौती:आयात पर सीमा शुल्क लगाया गया और निर्यात पर लगाए गए शुल्कों को धीरे-धीरे घटाया गया तांकि भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक बनाया जा सके।
  • दीर्घकालिक व्यापार नीति:विदेशी व्यापार नीति को लंबी अवधि के लिए लागू किया गया ।

नीति की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

(क) उदार नीति

(ख) विदेशी व्यापार पर सभी प्रकार के नियंत्रण हटा दिए गए है

(ग) बाजार में खुली प्रतियोगिता को प्रोत्साहित किया गया।

  • मुद्रा की आंशिक परिवर्तनशीलता: आंशिक परिवर्तनशीलता का अर्थ भारतीय मुद्रा को अन्य देशों की मुद्रा में एक निश्चित सीमा तक परिवर्तन करने से है । इसका सीधा फायदा यह हुआ कि अब विदेशी निवेशक या भारतीय निवेशक अपनी मुद्रा को आसानी से एक देश से दूसरे देश में ले जा सकते हैं ।
  • विदेशी निवेश की इक्विटी सीमा में बढोत्तरी: कई क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश की सीमा 40 से लेकर 100 फीसदी तक बढ़ा दी गई है। 47 उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में बिना किसी प्रतिबंधों के 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी गई है । इस नीति के लागू होने से भारत में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढेगा जो कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती प्रदान करेगा ।

नयी आर्थिक नीति के तहत निम्नलिखित कदम उठाए गए:

 वाणिज्यिक बैंकों द्वारा ब्याज दर का स्वयं निर्धारण: उदारीकरण नीति के तहत उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज की दरों को मानने की कोई बाध्यता नहीं होगी ।

  1. लघु उद्योग (एसएसआई) के लिए निवेश सीमा में वृद्धि: निवेश की सीमा बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दी गयी है, जिससे ये कंपनियों अपनी मशीनरी को उन्नत बनाने के साथ अपनी कार्यकुशलता में सुधार कर सकते हैं।
  2. सामान आयात करने के लिए पूंजीगत स्वतंत्रता: भारतीय उद्योग अपने समग्र विकास के लिए विदेशों से मशीनें और कच्चा माल खरीदने के लिए स्वतंत्र होंगे।
  1. उद्योगों के विस्तार और उत्पादन के लिए स्वतंत्रता: अब उद्योग बाजार की आवश्यकता के आधार पर स्वयं अपने उत्पादन के बारे में फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं।
  2. प्रतिबंधित कारोबारी प्रथाओं का उन्मूलन: एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथा (एमआरटीपी) अधिनियम 1969 के अनुसार, वो सभी कंपनियां जिनकी संपत्ति का मूल्य 100 करोड़ रूपये या उससे अधिक है, को निवेश निर्णय लेने के लिए सरकार से पूर्वानुमति प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

References:

jagranjosh.com/general-knowledge/1991-की-नयी-आर्थिक-नीति

drishtiias.com/hindi/mains-practice-question

hi.wikipedia.org/wiki/नयी_आर्थिक_नीति_१९९१

rajasthangyan.comविज्ञानकीप्रमुखशाखाएँएवंउनकेअध्ययनविषय

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