भारत की औद्योगिक नीति (Industrial Policy of India)

औद्योगिक नीति से अर्थ सरकार के उस चिन्तन (Philosophy) से है जिसके अन्तर्गत़ औद्योगिक विकास का स्वरूप निश्चित किया जाता है तथा जिसको प्राप्त करने के लिए नियम व सिद्धान्तों को लागू किया जाता है। किसी देश की औद्योगिक नीति (industrial policy) वह नीति है, जिसका उद्देश्य उस देश के निर्माण, उद्योग का विकास करना एवं उसे वांछित दिशा देना होता है।

औद्योगिक नीति का महत्व

किसी भी राष्ट्र के उचित एवं तीव्र औद्योगिक विकास के लिये सुनिश्चित, सुनियोजित एवं प्रेरणादायक औद्योगिकी नीति की आवश्यकता होती है, क्योंकि पूर्व घोषित औद्योगिक नीति के आधार पर ही कोई राष्ट्र अपने उद्योगों का आवश्यक मार्गदर्शन और निर्देशन कर सकता है। प्रत्येक राष्ट्र के औद्योगिक विकास के लिए औद्योगिक नीति निम्नलिखित प्रकार से महत्वपूर्ण होती है :

  1. वह देश के औद्योगिक विकास को सुनियोजित कर देश व अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती है।
  2. राष्ट्र को मार्गदर्शन व निर्देशन देती है।
  3. सरकार को निश्चित कार्यक्रम बनाने में मदद करती है।
  4. जनसाधारण को अपनी निश्चित जीविका का साधन बनाने में सहायता करती है।

भारत में औद्योगिक नीति का  विकास 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले

स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले भारत में किसी औद्योगिक नीति की घोषणा कभी नहीं की गई, क्योंकि भारत में ब्रिटिश सरकार का शासन था तथा उनकी नीति ब्रिटेन के हितों से प्रेरित थी और वह भारत में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन नहीं देना चाहती थी। द्वितीय महायुद्ध के अनुभवों के बाद सरकार ने देश में औद्योगिक नीति की आवश्यकता महसूस की जिसके फलस्वरूप सन् 1944 में नियोजन तथा पुनर्निर्माण (Planning and Reconstruction) विभाग की स्थापना की गयी। इस विभाग के अध्यक्ष सर आर्देशिर दलाल द्वारा 21 अप्रैल  1945 को एक औद्योगिक नीति विवरण पत्र जारी किया गया लेकिन व्यवहार में उसको क्रियान्वित न किया जा सका। ब्रिटिश सरकार ने भारत के औद्योगिक विकास के प्रति उदासीनता की नीति अपनाई और उनका सदैव यह प्रयास रहा कि भारत कच्चे माल का निर्यातक (Exporter) और निर्मित माल का आयातक (Importer) बना रहे।

 स्वतंत्र भारत में अब तक 6 औद्योगिक नीति की घोषणा हो चुकी है।

  1. पहली औद्योगिक नीति (1948)
  2. दूसरी औद्योगिक नीति (1956)
  3. तीसरी औद्योगिक नीति (1977)
  4. चौथी औद्योगिक नीति (1980)
  5. पाँचवीं औद्योगिक नीति (1990)
  6. छठी औद्योगिक नीति (1991)
  1. पहली औद्योगिक नीति (1948)

इसे प्रस्तुत करने का श्रेय श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जाता है। इसी में मिश्रित अर्थवयवस्था की नीति अपनाई गई और उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया प्रथम श्रेणी में 3 उद्योग रखे गए, द्वितीय श्रेणी में 6 उद्योग रखे गए तथा तृतीय श्रेणी में 18 उद्योगों को रखा गया।

  1. दूसरी औद्योगिक नीति (1956)

इसे प्रस्तुत करने का श्रेय जवाहर लाल नेहरू को जाता है। इसमें 17 उद्योगों पर केन्द्र सरकार का पूर्ण नियन्त्रण था तथा शेष उद्योगों पर निजी उद्योगपतियों का, जो विशेषकर उपभोक्ता वस्तु के उत्पादक थे।

  1. तीसरी औद्योगिक नीति (1977)

इसे प्रस्तुत करने का श्रेय जॉर्ज फर्नाडीज को जाता है। इसमें विशेष रूप से लघु व कुटीर उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। लघु उद्योगों को 3 वर्गों में रखा गया।

  1. अति लघु (Tinny Sector) : क्षेत्र की नई अवधारणा लागू की गई इसमें निवेश 1 Lakh रु. तथा इसकी स्थापना 50 हजार से कम क्षेत्र में की गई।
  2. जिला उद्योग केन्द्र : लघु उद्योग को एक स्थान पर सभी सुविधा उपलब्ध कराना।
  • संयुक्तक्षेत्रकीअवधारणाअपनाईगई। 
  1. चौथी औद्योगिक नीति (1980)

इसका उद्देश्य भारतीय अर्थ व्यवस्था का आधुनिकीकरण, विस्तार एवं पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना था।

  1. नईऔद्योगिकनीति 24 जुलाई 1995 : इसेरायमनमोहननीतिभीकहतेहैं।इसऔद्योगिकनीतिमेंउदारीकरणएवंभूमण्डलीकरणकोअपनाया गया।

इसके लिए निम्नलिखित मुख्य कार्य किए गए।

1973 में दत्त समिति की सिफारिश पर संयुक्त क्षेत्र का गठन हुआ, जबकि 1977, 1980 और 1990 की औद्योगिक नीतियों को ‘विस्तृत दिशा-निर्देशक’ की संज्ञा दी जा सकती है।

  1. पाँचवीं औद्योगिक नीति (1990)

पी वी नरसिम्हा राव ने 24 जुलाई 1991 को उदारवादी औद्योगिक नीति की घोषणा किया। इस औद्योगिक नीति में अर्थव्यवस्था को उदार बनाया गया और 18 उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया। बाद में 5 उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया। 

वर्तमान में लाइसेंस की आवश्यकता वाले पांच उद्योग :

  1. अल्कोहल युक्त पदार्थ का आसवन एवं इस से शराब बनाना
  2. इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस एवं समस्त प्रकार के रक्षा उपकरण
  • इटोनेटिंगफ्यूज़, सेफ्टीफ्यूज, गनपाउडर, नाइट्रोसेल्यूलोस, माचिससहित औद्योगिक विस्फोटक सामग्री
  1. खतरनाक रसायन
  2. तम्बाकू के सिगार एवं सिगरेट तथा विनिर्मित तम्बाकू के अन्य विकल्प

नई औद्योगिक नीति की प्रमुख विशेषताएं:

  • निजीकरण (Privatisation)
  • उदारीकरण (Liberalization)
  • वैश्वीकरण (Globalization)

नई औद्योगिक नीति 1991 में सार्वजनिक क्षेत्र हेतु केवल 8 उद्योग को रखा गया था, परंतु वर्तमान में आरक्षित उद्योगों की संख्या 3 हो गई है।

  1. परमाणु ऊर्जा
  2. रेलवे परिवहन
  • परमाणु ऊर्जा के काम में आने वाले खनिज

सार्वजनिक क्षेत्र : सार्वजनिक क्षेत्र में 1998 तक 8 उद्योगों सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे। 2001 में रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की 26% की छूट के बाद इसकी संख्या 4 से घटकर वर्तमान में 3 बची है।

  1. परमाणु ऊर्जा विभाग
  2. 15 मार्च, 1995 SO 212 केनिर्गत
  • रेलपरिवहन्

औद्योगिक रुग्णता (Industrial sickness)

ऐसे उद्योग जो वित्तीय संसाधनों के अभाव में बन्द पड़े हुए थे उनके पर्ननिर्माण के लिए मई 1987 में औद्योगिक एवं वित्तीय पुर्ननिर्माण बोर्ड (The Board for Industrial and Financial Reconstruction-B.I.F.R.) की स्थापना की गई। वर्तमान में यह निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के रुग्ण कम्पनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। औद्योगिक रुग्णता पर दो समितियाँ गठित हो चुकी हैं।

  • तिवारीसमिति 1985
  • ओमकारनाथगोस्वामीसमिति, 1993

बालकृष्ण इराडी समिति की सिफारिश पर 01 जून, 2016 को BIFR को समाप्त करके राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल (National Company Law Tribunal (NCLT)  की स्थापना की गई।

भारत में औद्योगिक गणना :

भारत में औद्योगिक आर्थिक गणना की शुरुआत 1977 में हुई इसमें गैर कृषि क्षेत्र के ऐसे उद्योग शामिल किए गए थे जिसमें कम से कम एक कर्मचारी नियमित रूप से रोजगार प्रापत करता हो। दूसरी, तीसरी क्रमशः 1980 तथा 90 में की गई। जिसमें कृषि तथा गैर कृषि दोनों क्षेत्र के उद्यम शामिल थे। चौथी आर्थिक गणना 1998 में तथा 5वीं 2005 में शुरू हुई और इसके अन्तिम परिणाम 12 जून, 2006 में प्रकाशित हुए।

इसके प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं :

  1. देश में कुल उद्यमों की संख्या 4212 करोड़ इसमें ग्रामीण क्षेत्र में581 करोड़ (61.5%) शहरी क्षेत्र में 1.631 करोड़ (38-7%)

 

  1. सर्वाधिक उद्यम वाले पॉच राज्य, इन पॉच राज्यों में कुछ उद्योगों का 50% से अधिक हिस्सा आता है।
  • पहले स्थान पर तमिलनाडु – 10.56%
  • दूसरे रथान पर महाराष्ट्र – 10.39%
  • तीसरे स्थान पर प. बंगाल – 10.77%
  • चौथे स्थान पर आन्ध्रप्रदेश – 9.55%
  • उत्तरप्रदेश – 9.53
  1. सर्वाधिक उद्यम वाले केन्द्र शासित राज्य
  • दिल्ली – 1.79%
  • चंडीगढ़ – 0.16%
  • पांडिचेरी – 0.12%
  1. सर्वाधिक रोजगार वाले 5 राज्य
    • महाराष्ट्र – 11.95%
    • तमिलनाडु – 9.97%
    • प. बंगाल – 9.42%
    • आन्ध्रप्रदेश – 8.96%
    • उत्तरप्रदेश – 8.63%

भारत में नवरत्न, महारत्न तथा मिनिरत्न

महारत्न और नवरत्न वे स्थितियां हैं जो भारतीय कंपनियां अनुकरणीय प्रदर्शन के माध्यम से कमा सकती हैं. एक विशिष्ट मापदंड है, जिस पर चुनी हुई इकाइयों को महारत्न या नवरत्न कहा जाता है. यह शीर्षक केवल सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (Central Public Sector Enterprises) को दिया जाएगा,. कुछ कंपनियों को  मिनीरत्न भी  प्रदान किए गए हैं जिन्होंने उत्कृष्ट( excelled in performance) और उल्लेख के योग्य (worthy of mention) प्रदर्शन दिखाया है :

हालिया रेटिंग के अनुसार

  • महारत्न – 10
  • नवरत्न -14
  • मिनिरत्न -74

एक महारत्न प्राप्त करने के लिए मानदंड

नीचे दिए गए मापदंड एक संगठन को महारत्न का स्थिति का निर्धारण करने के लिए महत्वपूर्ण है –

  • स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनी होनी चाहिए
  • औसतन 25,000 करोड़ रुपये का कारोबार होना चाहिए.
  • कंपनी का औसत शुद्ध लाभ रु. 50,000 करोड़ होना चाहिए.
  • कंपनी कीaverage net worth  15,000 करोड़ रु पिछले तीन वर्षों में हो.
  • पहले से ही एक नवरत्न पीएसयू द्वारा महारत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए.

नवरत्न का दर्जा पाने का मापदंड

नीचे दिए गए मापदंड एक संगठन को नवरत्न का दर्जा प्राप्त करने की आवश्यकता है:

  • पहले से ही मिनिरत्न की स्थिति होनी चाहिए
  • इसके अलावा पाँच में से तीन वर्षों के लिए या तो बहुत अच्छी या उत्कृष्ट की रेटिंग होनी चाहिए
  • ऐसे पैरामीटर हैं जिनके लिए कंपनी को स्कोर किया जाएगा और 100 में से 60 और ऊपर का एक आदर्श स्कोर नवरत्न शीर्षक का लाभ उठा सकता है.

मिनीरत्न का दर्जा पाने का मापदंड

केवल दो ही शर्तें हैं जिन्हें मिनीरत्न का दर्जा प्राप्त करने के लिए पूरा करने की आवश्यकता है

  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम जो लगातार तीन साल में मुनाफा कमाते हैं.
  • कंपनी के पास एक सकारात्मक निवल मूल्य होना चाहिए.

महारत्न और नवरत्न कंपनियों की सूची दी गई है:

Maharatna Companies in India Navaratna companies in India
भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड
भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड
कोल इंडिया लिमिटेड हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड
गेल (इंडिया) लिमिटेड  महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड
हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड
 इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड NBCC इंडिया लिमिटेड
NTPC लिमिटेड NMDC लिमिटेड
तेल और प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड NLC इंडिया लिमिटेड
पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ऑयल इंडिया लिमिटेड
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड
राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड
ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड
शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड
इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड

 

मिनीरत्न श्रेणी – II – केंद्रीय सरकारी उद्यमों के नाम इस प्रकार हैं;

1. भारतीय कृत्रिम अंग विनिर्माण निगम

2. भारत पंप और कंप्रेशर्स लिमिटेड

3. ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड

4. सेंट्रल रेलसाइड वेयरहाउस कंपनी लिमिटेड

5. इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स (इंडिया) लिमिटेड

6. FCI अरावली जिप्सम एंड मिनरल्स इंडिया लिमिटेड

7. फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड

8. HMT (इंटरनेशनल) लिमिटेड

9. भारतीय चिकित्सा एवं औषधि निगम लिमिटेड

10. मेकॉन लिमिटेड

11. राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम लिमिटेड

12. राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंट्स लिमिटेड

 

 महत्वपूर्ण समितियाँ / सिफारिश

  • 2006 के अधिनियम के अनुसार लघु उद्योगों को छोटे (Small) लघु (Micro) एवं मझोले (Midium) उद्यम के रूप में जाना जाता है। इस क्षेत्र में कुल 6 करोड़ लोगों का वर्तमान में रोजगार मिला है।
  • अति लघु क्षेत्रों के लिए निवेश की सीमा आबिद हुसैन समिति की सिफारिश पर 5 लाख से बढ़ाकर 25 लाख कर दिया गया है और लघु खेत्रों में निवेश की सीमा 2000-2001 में 3 करोड़ से घटाकर 1 करोड़ कर दिया गया है।
  • हथकरघा क्षेत्र के विकास हेतु 21 जनवरी, 1997 में मीरा सेठ की अध्यक्षता में समिति गठित की गई।
  • कपार्ट (The Council of Advancement of People’s Action and Rural Technology(CAPART) की स्थापना 1986 में की गई। यह ग्रामीण क्षेत्र के स्वैच्छिक संगठनों को तकनीकी विकास हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • MRTP 1969 के स्थान पर CCI (Competition Commission of India, Act), 2002: S. राघवन की अध्यक्षता में गठित समिति ने एकाधिकार के स्थान पर प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना की सिफारिश की। इसकी स्थापना 22 मई, 2000 में की गई और प्रभावी 2002 से हुई।
  • फेरा के स्थान पर फेमा FERA – FEMA (Foreign Exchange & Ragulatory Act) : 1973 के तहत विदेशी विनिमय का निर्धारित स्थिर दर पर कियाजाता था। इसका उद्देश्य विनिमय संसाधनों को बचाना ताकि इनका उचित प्रयोग हो सके। उदारीकरण के बाद इसके स्थान पर फेमा को जून, 2000 में लागू किया गया।

Reference :

https://www.thestudyiq.com/2019/02/industrial-policy-of-india-audyogik-niti.html

https://www.bharatgk.com/2018/04/industrial-policy-of-india-audyogik-niti.html

https://hindi.bankersadda.com/2020/07/complete-list-of-maharatna-navratna-companies-in-india-in-hindi.html

https://www.jagranjosh.com/general-knowledge/list-of-maharatna-navratna-and-miniratna-companies-in-india-in-hindi

 

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