डायन प्रथा (Witch Hunting)

डायन प्रथा की अवधारणा का इतिहास

डायन शिकार का प्रचलन प्राचीन इतिहास से ही देखने को मिलता है। 331 ईसा पूर्व में चुड़ैल के नाम पर 170 महिलाओं की हत्या का वर्णन मिलता है। यूरोप का तेरहवीं शताब्दी का पूरा इतिहास डायनों से भरा हुआ है। धार्मिक संस्थाओं का विरोध करने वाली महिलाओं को चुड़ैल के रूप में प्रस्तुत किया जाता, उन्हें गिरफ्तार किया जाता तथा दुर्भाग्य लाने वाली घोषित कर समाज रक्षा के नाम पर जला दिया जाता था। “द विच हंट इन अर्ली मॉडर्न यूरोप” (THE WITCH-HUNT IN EARLY MODERN EUROPE) नामक पुस्तक में ब्रायेन लेवाक (BRIAN LEVACK) लिखते हैं कि 1470 से लेकर 1750 के मध्य हज़ारों व्यक्तियों, जिनमें से अधिकतर महिलाएं थीं, पर डायन होने का मुकदमा चलाया गया। इनमे से लगभग आधे लोगों को जलाकर मार डाला गया। उनके अनुसार, आरंभिक मध्यकाल में हजारों लोगों को यूरोप मे काला जादू करने एवं डायन होने के आरोप में मार डाला गया था। वह आगे लिखते हैं कि डायन होने के कई मुक़दमे धार्मिक अदालतों में भी चले। संजय बसु मल्लिक द्वारा लिखी पुस्तक “डायन गाथा” से हमें पता चलता है की 15वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी के बीच लगभग एक लाख महिलाओं को डायन करार देकर जिंदा जला दिया गया। मध्यकाल एवं आरंभिक आधुनिक काल में धार्मिक संस्थानों ने यूरोप के लोगों की धार्मिक एवं नैतिक जीवन का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1550 के बाद यह मुक़दमे कानूनी अदालतों या कहें तो राजा के दरबारों में भी हल होने लगे थें।

भारत में डायन प्रथा

भारत मे डायन प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन यह कुप्रथा सदियों पुरानी है. राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में डाकन या डायन प्रथा कोई छह-सात सौ साल पहले से चलन में थी. इसके तहत अपनी जादुई ताकतों के कथित इस्तेमाल से शिशुओं को मारने के आरोप में महिलाओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती थी। उस दौर मे वहां हजारों औरतें इस कुप्रथा का शिकार हुई थीं. राजपूत रियासतों ने 16वीं सदी में कानून बना कर इस प्रथा पर रोक लगा दी थी. वर्ष 1553 में उदयपुर में पहली बार इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था. बावजूद इसके यह बेरोक-टोक जारी रही। कुछ जानकारों के मुताबिक, यह प्रथा असम के मोरीगांव जिले में फली-फूली। इस जिले को अब काले जादू की भारतीय राजधानी कहा जाता है। वर्तमान मे झारखण्ड, बिहार, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे 12 राज्यों में डायन शिकार अधिक प्रचलित है।

डायन प्रथा: आधुनिक भारतीय समाज का कलंक

विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाया है। कहने को तो हमारे देश की साक्षरता 74 प्रतिशत है लेकिन इसके विपरीत आए दिन अंधविश्वास के नाम पर घटित होने वाली प्रताड़ना व मारपीट की घटनाएं हमारे देश के खोखले विकास की पोल खोलकर रख देती हैं। एक ओर इसरो के सफल प्रक्षेपण की खबरें हमें खुश कर रही हैं तो वहीं दूसरी ओर अंधश्रद्धा की खबरें हमारी खुशी को ग़म में तब्दील कर रही है। ये अजीब कशमकश है जिसमें हमारा समाज और देश पिसता जा रहा है।

डायन घोषित करने का कारण

दिल्ली स्थित संगठन पार्टनर्स फॉर लॉ इन डेवलपमेंट नामक एक संगठन ने अपने हालिया शोध में कहा है कि डायन प्रथा की जड़ें पितृसत्तात्मक मानसिकता, आर्थिक झगड़ों, अंधविश्वास और दूसरी निजी और सामाजिक संघर्ष में छिपी हैं। ज्यादातर मामले पुलिस के पास ही नहीं पहुंचते। ऐसे में सरकारी आंकड़े इस भयावह समस्या की सही तस्वीर नहीं दिखाते। अधिकतर आदिवासी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में जमीन पर ज्यादा अधिकार प्राप्त होते हैं अत: संपत्ति पर अधिकार जमाने के लिए उन्हें डायन साबित करने की कवायद शुरू की जाती है, खासकर उन महिलाओं को निशाने पर रखा जाता है जिनके परिवार में कोई नहीं होता।

एक गैर-सरकारी संगठन सिटीजन फाउंडेशन के प्रमुख गणेश रेड्डी कहते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होने की वजह से आदिवासी गांवों में अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं, इसके साथ ही साक्षरता दर भी बहुत कम है।”

डायन jशिकार के नाम पर लोग निर्दोष महिलाओं को मारते हैं, उनका बलात्कार करते हैं, उनकी संपत्ति हासिल करने के लिए और कभी-कभी इसे प्रतिशोध के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, इनमे ज्यादातर विधवा, निःसंतान, निचली जाति की महिलाएं एवं वृद्ध दंपति शामिल हैं। इसके अलावा कई लोगों को स्थानीय राजनीति के कारण निशाना बनाया जाता है।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्रामीण और खासकर आदिवासी लोग किसी प्राकृतिक विपदा या किसी गंभीर बीमारी के फैलने की स्थिति में पहले नीम हकीमों या ओझाओं की शरण में जाते हैं, जब उन झोला छाप डॉक्टरों और ओझाओं से कुछ नहीं हो पाता तो वह पास-पड़ोस की किसी महिला को इसके लिए जिम्मेदार बताते हुए उसे डायन करार दे देते है। मौजूदा दौर में भी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं होने के कारण ऐसे डॉक्टर और ओझा-गुणी ही लोगों का सबसे बड़ा सहारा है। ओझा की ओर से डायन करार दी गई महिला का उत्पीड़न शुरू होता है जो उसकी जान के साथ ही खत्म होता है। ओझा के मुंह से निकला एक शब्द ही गांव के लोगों के लिए ब्रह्मवाक्य बन जाता है और लोग कानून हाथों में लेकर उस कथित डायन को उसके कर्मों की सजा दे देते हैं।

कैसे मान लिया जाता है डायन

डायन होने का आरोप उन महिलाओं पर लगाया जाता है जिनके पास कथित रूप से अलौकिक शक्तियां होती हैं। अज्ञानता और अशिक्षा के कारण दुर्भाग्यपूर्वक यह मान लिया जाता है कि वे नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी होती हैं तथा अपने स्वार्थपूर्ति और शक्ति को बढ़ाने के लिए समाज के लोगों का शिकार करती है। इन पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे अपने तंत्र का प्रथम प्रयोग स्वयं के पारिवारिक सदस्य या सदस्यों की बलि से करती हैं। उन्हें अलग-अलग नामों जैसे ‘चुडैल’, डायन, तोहनी आदि से पुकारा जाता है।

डायन के नाम पर अब भी हत्याएं क्यों है जारी?

1.  साक्ष्य का अभाव – डायन का शिकार करने वाले को दंडित करने के लिए न्यायालय को प्रमाण की आवश्यकता होती है। सामाजिक डर अथवा प्रथा की स्वीकृति से लोग चुप रहते हैं, जो सबूत इकट्ठा करने में बाधा बन जाते हैं। इसलिए सबूतों के अभाव में उचित न्याय नहीं मिल पाता है।

2.  राष्ट्रीय कानून का न होना – डायन प्रथा से अभिशप्त कई राज्य हैं जहाँ इसके विरुद्ध कोई विशेष कानून नहीं बनाया गया था और इसके पीछे एकमात्र कारण कुछ धार्मिक समूहों का विरोध है, जो मानते हैं कि अधिनियमित कानून उनके प्राचीन संस्कारों को छीन सकता है। ऐसे मे राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता है जो इसे प्रतिबंधित करने में सभी राज्यों पर बाध्यकारी प्रभाव डाले।

3.  प्रचलित कानूनों का उचित क्रियान्वनयन न हो पाना – जिन राज्यों ने कानून बनाए हैं वे प्रभावी नहीं हैं क्योंकि राष्ट्रीय कानून के अभाव में इसे कानूनी समर्थन नहीं मिल पता है। राज्यों के कानूनों की अप्रभाविता को राज्यों में लागू होने के उपरांत भी डायन-शिकार की बढ़ती घटनाओं के माध्यम से देखा जाता है।

डायन बताकर कर दी गई हजारों महिलाओं की हत्या

  • राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि 1991 से लेकर 2010 तक देशभर में लगभग 1,700 महिलाओं को डायन घोषित कर उनकी हत्या कर दी गई. हालांकि राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से लेकर 2014 तक देश में 2,290 महिलाओं की हत्या डायन बताकर कर दी गई.
  • 2001 से 2014 तक डायन हत्या के मामलों में 464 हत्याओं में झारखंड अव्वल रहा तो ओडिशा 415 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है, वहीं 383 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, 1987 से लेकर 2003 तक 2,556 महिलाओं की हत्या डायन के शक पर कर दी गई। रिपोर्ट बताती है कि हर साल कम से कम 100 से लेकर 240 महिलाएं डायन बताकर मार दी जाती हैं।
  • पिछले पांच साल (2015-20) की डायन-बिसाही से जुड़े आंकड़ों की बात करें तो 4 हजार 556 मामले दर्ज किए गए जिनमे 272 मामले हत्या से संबंधित हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या (215) महिलाओं हैं। यह जानकारी गृह विभाग की ओर से दी गई है। डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम के तहत वर्ष 2015 में 818 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2016 में 688, 2017 में 668, 2018 में 567, 2019 में 978 और 2020 में 837 मामले दर्ज किए गए हैं।

झारखंड का नाम सबसे ऊपर

  • भारत के ग्रामीण इलाकों में डायन-बिसाही (अंधविश्वास) बहुत बड़ी समस्या है। इस मामले में आदिवासी बहुल राज्य झारखंड का नाम सबसे ऊपर है। झारखण्ड में जादू टोना, अंधविश्वास और डायन बिसाही बताकर हत्या और प्रताड़ना के मामले काफी पहले से हैं | झारखण्ड में 1800 महिलाओं की इसी सन्दर्भ में निर्मम हत्या की जा चुकी है। सबसे अधिक मामले रांची, खूंटी, सरायकेला , गुमला , देवघर , लोहरदगा और लातेहार ज़िलों में देखने को मिलते हैं। जादू टोना या डायन बिसाही की बातें शहरों की अपेक्षा गाँव घरों में अधिक देखने को मिलती हैं।
  • अगर रोजाना के हिसाब से देखें तो झारखंड में 2 से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं, जो सप्ताह में 10 से ज्यादा हो जाते हैं। डायन-बिसाही के कारण वर्ष मे 50 से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ती है जिनमे अधिकांशता महिलाएं होती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक महीने लगभग 4 लोगों की हत्याएं डायन बिसाही के नाम पर होती आ रही है।
  • एनसीआरबी के आंकड़ोंके मुताबिक राज्य में वर्ष 2001 से 2014 के बीच डायन होने के आरोप में 464 महिलाओं की हत्या कर दी गई। जिनमे से ज्यादातर आदिवासी तबके की थीं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि एनसीआरबी के आंकड़े तस्वीर का असली रूप सामने नहीं लाते तथा डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं की तादाद इससे कई गुना अधिक हैं। ग्रामीण इलाकों में डायन के खिलाफ लोगों की एकजुटता के कारण अधिकांश मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाते हैं।

झारखण्ड राज्य से कुछ झकझोरने वाली घटनाएं

  • 2015 में झारखण्ड राज्य के मांडर प्रखंड में पांच महिलाओं को उनके घरों से जबरन बाहर निकाल कर डंडे और लोहे की छड़ से पिटाई कर उनकी निर्मम हत्या कर दी जाती है, गाँव वालो का आरोप था कि ये महिलाएँ काला जादू करती थी
  • 20 सितम्बर 2018 में झारखण्ड राज्य के ही ग्राम बुंडू में बुधनी देवी के डायन होने के शक में उसी के भतीजे ने कुल्हाड़ी से मार कर उसकी हत्या कर दी
  • 12 नवम्बर 2018 में झारखण्ड राज्य के चाईबासा जिले के चक्रधरपुर प्रखंड के कुरलिया गाँव के रणजीत प्रधान ने अपनी ही सास को डायन बताकर धारदार हथियार से मार डाला
  • 15 सितंबर, 2020 को राज्य की राजधानी रांची के बेड़ो थाना के इलाके में नेहालु पंचायत के रोगाडीह पतरा टोली गांव में ग्रामीणों द्वारा डायन के शक में एक दंपत्ति की हत्या कर दी गई। मृतकों में 75 वर्षीय मंगरा उरांव और उनकी 55 वर्षीया पत्नी बिरसी उराइन थे।
  • 17 अगस्त, 2020 को गिरिडीह के गांवा थाना क्षेत्र के खेसनरो गांव में एक 30 वर्षीय महिला गीता देवी को डायन बता कर कुल्हाड़ी एवं लाठी से मार कर हत्या कर दी गयी।
  • 7 जुलाई, 2020 को साहिबगंज जिले के राधानगर थाना क्षेत्र की मोहनपुर पंचायत के मेंहदीपुर गांव की मतलू चौराई नामक एक 60 वर्षीय महिला की हत्या गांव का ही सकल टुडू ने डायन बताकर कर दी। उसे शक था कि महिला ने उसके बेटे को जादू टोना कर मार दिया है।
  • 4 जुलाई, 2020 को रांची के लापुंग थाना क्षेत्र के चालगी केवट टोली के दो भाइयों हेमंत होरो व बुधुआ होरो ने अपनी ही चाची 56 वर्षीया फुलमनी होरो की डायन होने के संदेह में हत्या कर दी। दोनों भाइयों के पिता बीमार रहते थे और उन्हें यह संदेह था कि उनकी चाची ने उन्हें टोना कर दिया है, जिससे उसके पिता बीमार हैं।
  • वर्ष 2022 के 2 जनवरी को ही गुमला के सिसई प्रखंड के लकेया गाँव से एक हृदयविदारक घटना देखने को मिली जब एक महिला के डायन होने के आरोप में उसके दो बेटों, संजय उरांव और अजय उरांव को खम्भे से बांध कर पीटा गया जिसमे अजय उरांव की एक आँखें फूट गईं।

डायन प्रथा के कारण झारखण्ड राज्य में वर्षवार हत्याएं

झारखण्ड राज्य में अलग अलग वर्षो में कुल डायन-बिसाही सम्बंधित हत्याओ का ब्यौरा प्रस्तुत किया गया है ।

वर्ष हत्याएं
2011 36
2012 33
2013 47
2014 38
2015 47
2016 27
2017 41
2018 26

झारखण्ड सरकार की पहल

कुप्रथा से निपटने के लिए सरकार ने बजट को दुगना कर दिया
मुहल्लों, गांवों, पंचायतों में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। वहीं आंगनबाड़ी केंद्रों और विद्यालयों में भी इस मुहिम को आगे बढ़ाया गया है। पोस्टर, पेंटिंग और बच्चों से राइटिंग कराई जा रही है। चौक-चौराहे, प्रमुख स्थल, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर होर्डिंग लगाया गए हैं तथा सभी जिलों में जागरूकता रथ भी चलाया जा रहा है। डायन कुप्रथा के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम में वित्तीय वर्ष 2020-21 में जहाँ 62 लाख 71 हजार रुपए खर्च किए गए वहीँ वित्तीय वर्ष 2021-22 में इसे बढ़ा कर 1 करोड़ 20 लाख रुपए कर दिया गया है।

डायन प्रथा को रोकथाम हेतु कानूनी प्रावधानवर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर कोई विशिष्ट अथवा विशेष कानून नहीं है जो चुड़ैल के शिकार को दंडित करता हो इसलिए भारतीय दंड संहिता 1860 के प्रावधानों को पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे धारा-302 जो हत्या, धारा-307 हत्या का प्रयास, धारा-323 चोट पहुँचाने, धारा-376 बलात्कार के लिए दंड से सम्बंधित हैं तथा धारा 354 स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग के आरोप मे लगाई जाती है।भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के अलावा विभिन्न राज्य डायन शिकार की समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग कानून लेकर आए हैं।

1.  बिहार: सबसे पिछड़ा राज्य होने के बावजूद बिहार ने महिलाओं को अमानवीय व्यवहार से बचाने के साथ-साथ पीड़ित को दुर्व्यवहार का कानूनी सहारा प्रदान करने के लिए 20 अक्टूबर 1999 को डायन शिकार के खिलाफ डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियमपारित किया और ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बना।

2.  झारखण्ड : झारखंड ने बिहार के कानून को अंगीकार करते हुए “डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 2001″ को लागू किया। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी को डायन करार देता है अथवा किसी दूसरे व्यक्ति को ऐसा करने अथवा डायन के नाम पर प्रताड़ित करने के नाम पर उकसाता है, तो उसे 3 महीने की सजा या 1000 का जुर्माना या दोनो हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन करार देकर मानसिक अथवा शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता है, तो उसे 6 महीने की सजा या 2000 का जुर्माना या दोनो हो सकता है। वहीँ कोई व्यक्ति किसी डायन घोषित महिला का इलाज टोना-टोटका, झाड़-फूंक या शारीरिक यातना के माध्यम से करता है, तो उसे 1 साल की सजा या 2000 का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

3.  छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में 2005 में “टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम” बनाया गया, जिसके तहत डायन बताने वाले शख्स को 3 से लेकर 5 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

4.  राजस्थान: राजस्थान सरकार ने महिला अत्याचार रोकथाम और संरक्षण कानून 2011 में डायन हत्या के लिए अलग से धारा 4 को जोड़ा है। इस धारा के तहत किसी महिला को डायन, डाकिन, डाकन, भूतनी बताने वाले को 3-7 साल की सजा और 5-20 हजार रुपए का जुर्माना भरने का प्रावधान किया गया है।

5.  असम: डायन हत्या जैसी कुप्रथा के ख़िलाफ़ बीरुबाला के आंदोलन की बदौलत असम सरकार ने 2015 में “असम डायन प्रताड़ना (प्रतिबंध, रोकथाम और संरक्षण) क़ानून” बनाया है। इस क़ानून में किसी को डायन क़रार देना या फिर डायन के नाम पर किसी का शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करने को संज्ञेय अपराध माना जाता है और ग़ैर ज़मानती धाराएं लगाई जाती हैं। इस क़ानून में अभियुक्तों को पांच वर्ष के कारावास से लेकर अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है।

रोकथाम के लिए क्या करना चाहिए

·         राष्ट्रीय स्तर पर कड़े कानून बनाना चाहिए।

·         शिक्षा और स्वास्थ सुविधा का लाभ समाज के पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में सुचारू रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

·         डायन प्रथा को रोकने के लिए कानून को सख्ती से लागू करने के साथ साथ पुलिस प्रशासन तथा सम्बंधित विभाग को संवेदनशील बनाया जाना चाहिए।

·         गैर-सरकारी संगठनों को साथ लेकर सार्थक बदलाव का प्रयास किया जाना।

·         पिछड़े क्षेत्रों में जादू टोना अधिक प्रचलित है अत: ऐसे इलाकों में जागरूकता कार्यक्रम को प्रभावी रूप से चलाया जाना चाहिए।

·         चूँकि इसका शिकार वृद्ध, विधवा और मानसिक रूप से विछिप्त महिलाएं आसानी से हो जाती हैं, अत: सरकारी स्तर पर इनको संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।

·         जादू टोना और डायन कुप्रथा को देश के सभी राज्यों के विद्यालयों में एक विषय के रूप में जोड़ा जाना चाहिए।

डायन प्रथा से लड़ने वाले कुछ प्रमुख योद्धाओं की कहानी

1.  पद्मश्री छुटनी देवी (Chutni Devi) का संघर्षपूर्ण जीवन

झारखंड के सरायकेला-खरसांवा जिले के कोलाबिरा, वीरबांस गांव की रहने वाली छुटनी देवी को इस वर्ष देश के राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री सम्मान प्राप्त हुआ है। उनकी बड़ी शख्सियत बनने की एक शानदार दास्तां है. छुटनी देवी 3 सितंबर 1995 का दिन कभी भूल नहीं सकतीं हैं। इस दिन गांव में बैठी पंचायत ने यह कहते हुए कि तुम डायन हो, पड़ोसी की बेटी के बीमार होने का जुर्म इनके माथे मढ़ दिया था। पंचायत ने उनपर 500 रुपये का जुमार्ना भी लगाया था और दबंगों के खौफ से छुटनी देवी ने जुमार्ना भर भी दिया। बीमार बच्ची अगले रोज भी ठीक नहीं हुई तो 4 सितंबर को एक साथ 40-50 लोगों ने उनके घर पर धावा बोल, उन्हें खींचकर बाहर निकाला, उनके तन से कपड़े खींच लिए गए तथा उन्हें बेरहमी से पीटा गया, इतना ही नहीं, उनपर मल-मूत्र तक फेंका गया। आज अपने संघर्ष, जुझारूपन और इच्छशक्ति के बल पर उन्हीं छुटनी देवी की पहचान एक ऐसी ‘वीरांगना’ के रूप में है, जिन्होंने पूरे झारखंड में डायन-भूतनी कहकर प्रताड़ित की गई सैकड़ो महिलाओं को नरक जैसी जिंदगी से बाहर निकाला है। आज छुटनी देवी की मदद से चाईबासा, सरायकेला-खरसांवा, खूंटी, चक्रधरपुर के साथ साथ छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों की 500 से भी अधिक महिलाओं की जिंदगी में नई रोशनी आ चुकी है।

छुटनी देवी की मुलाकात वर्ष 1996-97 में फ्री लीगल एड कमेटी (फ्लैक) के कुछ सदस्यों से हुई. फिर, उनकी कहानी मीडिया में आई. नेशनल जियोग्राफिक चैनल तक बात पहुंची तो उनके जीवन और संघर्ष पर एक डाक्यूमेंट्री बनी। सन 2000 में गैर सरकारी संगठन “एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा)” ने उन्हें समाज परिवर्तन और अंधविश्वास के खिलाफ अभियान से जोड़ा। उन्होंने यहां रहकर सामाजिक जागरूकता के तौर-तरीके समझे और जाना कि कानून की मदद से कैसे अंधविश्वासों से लड़ा जा सकता है। फिर, हर उस गांव में जाती जहां किसी को डायन-ओझा कहकर प्रताड़ित करने की शिकायत मिलती, गांव वालों को समझाने की कोशिश करती इसके उपरांत जुल्म झेल रहीं डेढ़ सौ से ज्यादा महिलाओं का रेस्क्यू कराया। धमकियां भी मिलीं, पर उन्होंने किसी की परवाह नहीं की तथा एनजीओ के जरिए रेस्क्यू की गई महिलाओं को स्वरोजगार के साधनों से जोड़ा। सिलाई-बुनाई, हस्तकला, शिल्पकला और दूसरे काम का प्रशिक्षण दिलाने में सहायता की। बीरबांस में ही आशा का एक पुनर्वास सह परामर्श केंद्र बनाया गया, जो पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रय गृह है तथा यह मुहिम बदस्तूर जारी है।

  1. पद्मश्री बीरुबाला के आंदोलन की बदौलत बना असम का कानून

दरअसल 1996 में बीरुबाला राभा के बड़े बेटे धरमेश्वर को जब टायफाइड हो गया था और वह उसे लेकर गांव के एक वैध के पास गई तो उसने बतलाया कि उनका बेटा एक जादूगरनी के चक्कर में पड़ गया है और वह उसके बच्चे की मां बननी वाली है। जैसे ही उस बच्चे का जन्म होगा, उनका बेटा मर जाएगा परन्तु कई महीने बीत जाने के बाद भी उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।

वैध की बात झूठी साबित होने पर उन्हें लगा कि ये लोग जादू-टोना कर आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित कर रहे हैं तथा महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित किया जा रहा है। उसी समय उन्होंने ठान लिया कि समाज को डायन जैसी कुप्रथा और अंधविश्वास से मुक्त करवाने की दिशा में काम करेंगी। उसके बाद से उन्होंने गांव की महिला समिति से जुड़कर डायन संबंधी जागरुकता पर अंदर ही अंदर काम करना प्रारम्भ किया, इस दौरान कई ग़ैर सरकारी संगठनों के लोगों से मुलाक़ात हुई और धीरे-धीरे इस अंधविश्वास के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करती चली गईं।

असम-मेघालय सीमावर्ती ग्वालपाड़ा ज़िले के ठाकुरबिला जैसे एक छोटे से गांव में रहने वाली बीरुबाला ने डायन हत्या के ख़िलाफ़ 22 साल पहले जब आंदोलन शुरू किया था उस समय उनके गांव के लोगों ने उन्हें तीन साल तक समाज से बाहर कर दिया था, परन्तु आज वह जहां भी जाती हैं उनसे मिलने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती है। लोग उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं, सेल्फी और ऑटोग्राफ लेते हैं, पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। बीरुबाला के ही अथक प्रयास से असस राज्य में डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनाने में सफलता मिली है।

  1. बिहार में बने कानून का श्रेय प्रेमचंद को जाता है

बिहार राज्य मे डायन प्रथा प्रतिरोध कानून लागू करवाने का श्रेय जमशेदपुर, झारखंड के प्रेमचंद को जाता है जो इस प्रथा के खिलाफ आज तक संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 1991 में अखबारों में खबर छपी जिसमे करनडीह की एक महिला को डायन बताकर उसके पति व बेटे की हत्या कर दी गई तथा उसे गांव से निकाल दिया गया। इस घटना ने प्रेमचंद को झकझोर दिया। उनकी अगुवाई में फ्री लीगल एड कमेटी ने घटना की रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को भेजी। आयोग ने दो लोगों को जांच के लिए भेजा भी परन्तु उस जांच के आधार पर आयोग का जवाब आया कि डायन प्रथा जैसी कोई बात नहीं है। इसी बीच वर्ष 1995 में सरायकेला- खरसावां स्थित कुचाई गाँव में डायन के नाम पर एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी गई। एक बच्ची बच गई जिसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इस घटना के बाद सिंहभूम के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने मदद की जिससे बिहार विधानसभा से इस प्रथा के खिलाफ कानून बनवाने मे वे कामयाब हुए। प्रेमचंद की संस्था फ्लैक (फ्री लीगल एड कमेटी) ने ही बिहार सरकार को डायन कुप्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1995 का ड्राफ्ट सौंपा था। इसी के आधार पर बिहार सरकार ने 1999 में कानून बनाया था। देश में यह पहली सरकार थी, जिसने डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनाया। इस अभियान मे पटना एवं रांची के कई पत्रकारों ने उनका काफी साथ दिया। अब भी जहां कहीं भी डायन के नाम पर हत्या या उत्पीडऩ की शिकायत मिलती है, प्रेमचंद वहां पहुंच जाते हैं। वह पीडि़त की मदद करने के साथ प्रताड़ित करने वालों को सजा दिलाने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए भी तत्पर रहते हैं।

References:

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