अमर शहीद शेख भिखारी Shaikh Bikhari

परिचय

अमर शहीद शेख भिखारी का नाम छोटानागपुर के इतिहास में सुनहले अक्षरों में लिखा गया है। उनका जन्म ओरमांझी थाना के बुढ़मू प्रखंड के ग्राम खुदिआ (खोदया) में में 1819 में एक बुनकर अंसारी परिवार में हुआ था। खुदीआ, लूटवा गाँव और मांझी से 9 किलोमीटर दूर सिकिदरी जाने वाले मार्ग पर स्थित है।  1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इस महान योद्धा और ओजस्वी सेनापति ने बड़ी वीरता और साहस के साथ अंग्रेजों के दांत खट्टे किये थे। कहा जाता है कि उनकी तलवार में इतनी ताकत थी कि अंग्रेज कमिश्नर मैकडोनाल्ड ने इसका गजट में जिक्र किया था और उन्हें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में खतरनाक बागी करार दिया गया था।इस समय इनकी आयु 38 साल थी। 

शेख भिखारी के पिता शेख बूलंदू

छोटानागपुर की वीर धरती के अमर लाल शहीद शेख भिखारी के पिता का नाम शेख बूलंदू (बल्दू) था जो अपने समय के एक नामी बहादूर थे। उस समय अनगड़ा थाने के अंतर्गत औरगढ़ नामक एक राज था जिसके राजकुमार ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि उसे हिरण का दूध चाहिए। शेख बूलन्दू ने (बलदू) जंगल से दूध देने वाली एक हिरन को पकड़कर कंधे पर उठाकर राजकुमार के सामने पेश कर दिया था। महारानी ने प्रसन्न होकर एक शाही तलवार और पगड़ी के साथ – साथ बारह गांवों की जमीन्दारी इन्हें जागीर स्वरुप प्रदान की थी। वे बारह गाँव हैं – खूदिया (खौदिया) लूटवा, बोनी लूटवा, कूटे, सांडी (संडिहा), भूसौर, रोल, मूटा, हेन्दा, बेली, चारू, बैठ, नगड़ू। कहा जाता है कि वह तलवार अभी भी जरिया गढ़ (गोबिंदपुर) में उपलब्ध है तथा प्रत्येक वर्ष विजयदशमी के अवसर पर एक जुलूस की शकल में उसे निकाला जाता है  तथा उसके प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया जाता है।

शेख भिखारी का बचपन

1857 की जंग ए आजादी में लड़ने वाले बचपन से वे अपना खानदानी पेशा मोटे कपड़े तैयार करते और हाट-बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश में सहयोग करते थे। बचपन से ही सैन्य संचालन में दक्षता के साथ जमीन्दारी के कामों का भी उन्हें अच्छा खासा अनुभव था जब उनकी उम्र 20 वर्ष की हुई तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली. जल्द ही उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुक़ाम हासिल कर लिया. बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया़ शेख भिखारी के जिम्मे में बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया. उन्होंने अपना पूरा जीवन ओरमांझी, खोदिया में बिताया।

शेख भिखारी को मिली ज़िम्मेदारियाँ

मांझी खटंगा के राजा टिकैत उमराव सिंह न उनकी वीरता एवं बुद्धिमता से प्रभावित होकर उन्हें अपना दीवान नियुक्त किया था। इसके अतिरिक्त ठाकुर विश्वनाथ शाही (बड़कागढ़ – हटिया) ने शेख भिखारी को मुक्तिवाहिनी का सक्रिय सदस्य बनाया था जिसमें ठाकुर विश्वनाथ शाही, पाण्डेय गणपत राय (भौनरो) जयमंगल पाण्डेय, नादिर अली खां, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी, बृज भूषण सिंह, चमा सिंह, शिव सिंह, रामलाल सिंह, बृज राम सिंह आदि थी।

नायक शेख भिखारी का जंग ए आज़ादी मे योगदा

अचानक अंग्रेज़ों ने 1857 में चढ़ाई कर दी.विरोध में रामगढ़ के हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंग्रेज़ अफ़सर को मार डाला. नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फ़ौज में शामिल हो गये. इस तरह जंग ए आज़ादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी. रांची जिला में डोरंडा की सेना ने 31 जुलाई 1857 ई. को जो विद्रोह किया था उसका नेतृत्व जमादार माधव सिंह और सूबेदार नादिर अली खां ने किया था जिसका केंद्र चुटूपालू घाटी तथा ओरमांझी था। शेख भिखारी इस संग्राम में सम्मिलित थे। रणकुशल एवं दूरदर्शी शेख भिखारी ने सूबेदार नादिर अली, जमादार माधव सिंह को हर संभव सहयोग का विश्वास दिलाया, शेख भिखारी ने सैन्य सामग्रियों को ढोने के अतिरिक्त क्रांतिकारियों को अनके प्रकार से सहायता प्रदान की। अंग्रेज कप्तान ग्राहम तथा तीन अन्य अंग्रेज हजारीबाग भाग गये। रांची, चाईबासा, संथाल परगना के ज़िलों से अंग्रेज़ भाग खड़े हुए.

इसी बीच अंग्रेज़ों की फ़ौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गयी और चुट्टूपालू के पहाड़ के रास्ते से रांची के पलटुवार चढ़ने की कोशिश करने लगे. दो तोपों को रांची की तरफ मोड़ दिया गया,

उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंग्रेज़ों का रास्ता रोक दिया. शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़वा दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम करवा दिया. शेख़ भिखारी की फ़ौज ने अंग्रेज़ों पर गोलियों की बौछार कर अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिये.

यह लड़ाई कई दिनों तक चली. शेख़ भिखारी की फ़ौज के पास गोलियां ख़त्म होने लगी तो शेख़ भिखारी ने अपनी फ़ौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया. इससे अंग्रेज़ फ़ौजी कुचलकर मरने लगे. यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली. फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये. इसकी खबर शेख़ भिखारी और उनकी फ़ौज को नहीं हो सकी. अंग्रेज़ों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को 6 जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ़्तार कर लिया और 7 जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फ़ौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख़ भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया.

शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह की शहादत

जब चुट्टूपालु की घाटी में भीड़ बढ़ती गई, परिजनों का करुण क्रंदन बढ़ता गया अपार भीड़ के उमड़ते हुए आवेग से भयभीत होकर मेकडोनाल्ड ने रांची – ओरमांझी रास्ते में मोराबादी टैगोरहिल के निकट एक पेड़ (बरगद) की दो टहनियों पर लटका कर, एक झटके में बंधन काट डाला तथा शेख भिखारी और टिकैत उमराव का शरीर फट कर दो टूकड़े हो गया, इतनी दर्दनाक मौत को इन वीर बांकूड़ों ने गले लगा लिया और उनके लाशों को चुटूपालू लाकर कर एक बरगद के पेड़ पर लटका दिया गया। मोराबादी के इस ऐतिहासिक स्थल को आज भी लोग फांसी टोंगरी कहते हैं।  कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 8 जनवरी 1858 ई. को चुटूपालू घाटी में ही इन्हें फांसी दी गई जिसके कारण उस बरगद के पेड़ को फंसियारी बरगद कहा जाता है – चुटूपालू की घाटी में लटकाई इन दोनों शूरमाओं की लाशों को चील कौओं ने नोच – नोच कर अपना पेट भरा। यह पेड़ आज भी चुटूपालू घाटी में प्रेरणा स्थल के रूप में मौजूद है। आठ जनवरी को झारखंड वासी उन्हें याद कर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

1857 की क्रांति में राजा उमराव सिंह, उनके छोटे भाई घांसी सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी ने जिस शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन किया था उनकी अनुगूंज आज भी ओरमांझी और उसके निकटवर्ती इलाकों में सुनाई पड़ती है।

स्त्रोत:

जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, झारखण्ड सरकार

hi.vikaspedia.in/education/

jagran.com/jharkhand/ranchi-10992743.html

 

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